Rao.asgar unani physician hakeem

Rao.asgar unani physician hakeem

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सामान्य रोग, पेट, गैस, ताक़त पेशाब रोग माहिर

03/10/2026

❄️ सर्दियाँ आ रही हैं—बुज़ुर्गों के लिए एहतियात ज़रूरी है

सर्द मौसम अपने साथ सिर्फ़ ठंड नहीं लाता, बल्कि उम्रदराज़ लोगों के लिए कुछ अतिरिक्त सावधानियाँ भी लेकर आता है।

यूनानी तिब्ब की नज़र में बढ़ती उम्र के साथ हरारत-ए-ग़रीज़ी (حرارتِ غریزی) में कमी आती है और बदन में बलग़मी माद्दे के ग़लबे की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। इसलिए सर्दियों में बुज़ुर्गों को ठंड से बचाव, खान-पान और रोज़मर्रा की गतिविधियों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

खास तौर पर वे लोग जिन्हें हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़, जोड़ों का दर्द (वजा-उल-मफ़ासिल), अकड़न या चलने-फिरने में तकलीफ़ रहती है, उन्हें ठंड के मौसम में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

🧣 शरीर को पर्याप्त गर्म रखें,
🥣 गर्म और हल्की पौष्टिक चीज़ों को प्राथमिकता दें,
🚶 अपनी क्षमता के अनुसार हल्की गतिविधि जारी रखें,
💧 पानी पीना कम न करें,
💊 और पहले से चल रही दवाओं को डॉक्टर की सलाह के बिना बंद या बदलें नहीं।

याद रखिए—सर्दी से बचाव सिर्फ़ गर्म कपड़े पहनने का नाम नहीं, बल्कि अपने शरीर की उम्र और उसकी ज़रूरत को समझना भी है।

“उम्र के इस पड़ाव पर ज़रा-सी एहतियात,
कई परेशानियों को दूर रखने की हिकमत बन जाती है।”
आम कमजोरी के लिए हमदर्द का माउल्लहम निहार मुंह 60 ml, रोज़ ले सकते है। हलवा ए बेज़ाय मुर्ग हमदर्द,लहमीना, नाश्ते में दलिया, लिजिये । दही, छाछ, लस्सी, ठंडी चीजों से परहेज कीजिए।

Rao Asgar Unani physician saharanpur
Free consultation DM

01/10/2026

🚶‍♂️ पैदल चलना—कितना, कैसे और क्यों?

नई रिसर्च ने चलने की कहानी को थोड़ा और समझदारी से समझाया है

कभी डॉक्टर कहते थे—
“रोज़ सुबह टहल लिया कीजिए, सेहत ठीक रहेगी।”

फिर आया 10,000 कदम रोज़ का दौर।

लेकिन अब विज्ञान की तस्वीर कुछ और साफ़ हो रही है।

नई रिसर्च यह नहीं कहती कि पैदल चलना पुरानी बात हो गई।
बल्कि वह कहती है—

चलना आज भी ज़रूरी है, मगर सवाल सिर्फ यह नहीं कि “कितने कदम?”
सवाल यह भी है—कितनी देर, किस रफ्तार से और आपकी अपनी क्षमता कितनी है?

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🌿 हर कदम की अपनी कीमत है

सबसे पहले एक अच्छी खबर।

अगर कोई व्यक्ति बिल्कुल व्यायाम नहीं करता और वह रोज़ थोड़ा-सा चलना शुरू करता है, तो यह भी स्वास्थ्य की दिशा में एक कदम है।

यानी शुरुआत करने वाले व्यक्ति को यह सोचकर निराश होने की जरूरत नहीं कि—

“मैं तो 10,000 कदम नहीं चल सकता, इसलिए चलने का फायदा ही क्या?”

ऐसा नहीं है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, शारीरिक गतिविधि की कुछ मात्रा भी बिल्कुल निष्क्रिय रहने से बेहतर है। वयस्कों के लिए सप्ताह में कम-से-कम 150 मिनट moderate-intensity physical activity का लक्ष्य रखा जाता है; 65 वर्ष से अधिक उम्र में भी यही मूल लक्ष्य है, लेकिन क्षमता और mobility के अनुसार इसमें बदलाव जरूरी हो सकता है।

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🚶‍♂️ धीमी चाल या तेज़ चाल?

यहाँ से बात थोड़ी दिलचस्प होती है।

धीरे-धीरे चलना भी अच्छा है।
लेकिन अगर शरीर इजाज़त देता है तो कुछ समय ऐसी चाल से चलना, जिससे सांस और दिल की धड़कन थोड़ी तेज़ हो जाए, स्वास्थ्य के लिए अतिरिक्त लाभ दे सकता है।

इसे आम भाषा में Brisk Walking कह सकते हैं।

आसान पहचान यह है—

«चलते हुए बात कर सकें, मगर ऐसा महसूस हो कि शरीर काम कर रहा है।»

लेकिन हर व्यक्ति को तेज़ चलना जरूरी नहीं।

उम्र, वजन, घुटनों की हालत, सांस की तकलीफ, दिल की बीमारी और दूसरी स्वास्थ्य स्थितियों के हिसाब से walking की मात्रा और रफ्तार अलग हो सकती है।

सेहत में भी एक ही चाबी से हर ताला नहीं खुलता।

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🔢 क्या 10,000 कदम जरूरी हैं?

यह सवाल बहुत लोगों के मन में है।

नई systematic review में 57 studies और 35 cohorts के आंकड़ों का अध्ययन किया गया। इसमें कई स्वास्थ्य परिणामों के लिए लगभग 5,000–7,000 कदम प्रतिदिन के आसपास महत्वपूर्ण लाभों से संबंध पाया गया। शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि 10,000 कदम उन लोगों के लिए अब भी एक व्यवहार्य लक्ष्य हो सकता है जो अधिक सक्रिय हैं, लेकिन यह हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य संख्या नहीं है।

इसका मतलब यह नहीं कि—

“7,000 कदम ही सही संख्या है।”

बल्कि असली संदेश है—

अपने शरीर की क्षमता के अनुसार नियमित रूप से सक्रिय रहिए और धीरे-धीरे अपनी क्षमता बढ़ाइए।

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🪑 एक और नई सोच—सिर्फ Walking नहीं, “कम बैठे रहना” भी

आज physical activity की चर्चा में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई है।

सिर्फ सुबह आधा घंटा चल लेना और फिर पूरा दिन कुर्सी पर बैठे रहना आदर्श स्थिति नहीं मानी जाती।

दिन में छोटे-छोटे अंतराल पर उठना, कुछ देर चलना, सीढ़ियां संभव हों तो इस्तेमाल करना और लंबे समय तक लगातार बैठे रहने को तोड़ना भी अच्छी आदतें हैं।

यानी—

Exercise का मतलब सिर्फ पार्क का चक्कर नहीं,
बल्कि पूरे दिन शरीर को थोड़ा-थोड़ा सक्रिय रखना भी है।

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🌹 यूनानी तदबीर की भाषा में देखें तो...

यूनानी तिब में रियाज़त और तदबीर का अपना महत्व है।

जिस्म को बिल्कुल आराम की चीज़ बना देना भी मुनासिब नहीं और शरीर की क्षमता से ज्यादा उसे थका देना भी समझदारी नहीं।

एक खूबसूरत संतुलन चाहिए—

न बहुत कम, न जरूरत से ज्यादा।

शरीर की हालत देखिए, उम्र देखिए, मिज़ाज देखिए और फिर रियाज़त की मात्रा तय कीजिए।

शायद इसी बात को शायराना अंदाज़ में यूँ कहा जा सकता है—

«“कदम छोटे हों तो भी सफ़र रुकता नहीं,
बस चलने का सिलसिला टूटना नहीं चाहिए।”»

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❤️ लेकिन एक जरूरी एहतियात

हर व्यक्ति के लिए walking की सलाह एक जैसी नहीं हो सकती।

अगर चलते समय सीने में दर्द या दबाव, असामान्य सांस फूलना, बेहोशी जैसा महसूस होना, तेज़ चक्कर या अचानक कमजोरी महसूस हो तो केवल “चलते रहिए” वाली सलाह उचित नहीं है।

ऐसी स्थिति में exercise रोककर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

खासकर बुज़ुर्गों और हृदय, फेफड़े या गंभीर जोड़ों की समस्या वाले लोगों को अपनी walking routine अपनी स्वास्थ्य-स्थिति के अनुसार तय करनी चाहिए।

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🌱 तो आखिर आज की सलाह क्या है?

चलना छोड़िए मत।
10,000 कदम की संख्या से डरिए मत।
और अपनी क्षमता से बाहर जाकर खुद को थकाइए भी मत।

पहले नियमितता लाइए।

फिर समय बढ़ाइए।

शरीर साथ दे तो चाल थोड़ी तेज़ कीजिए।

और पूरे दिन बैठे रहने की आदत को बीच-बीच में तोड़ते रहिए।

क्योंकि सेहत का रास्ता किसी एक दिन की मेहनत से नहीं बनता—

«“सेहत कोई मंज़िल नहीं,
रोज़ उठाया गया एक छोटा-सा कदम है।”»

Rao Asgar Unani physician

यह लेख सामान्य स्वास्थ्य-शिक्षा के उद्देश्य से है। व्यक्तिगत बीमारी या दवा के मामले में अपने चिकित्सक की सलाह को प्राथमिकता दें।

#यूनानी

28/09/2026

FB पोस्ट___ उम्र, आइना और बाज़ार की साज़िश 😄

खुद को बढ़ती उम्र के साथ स्वीकार लेना—यही असली तनावमुक्त लाइफ प्लान है।
हर उम्र अपनी एक खूबसूरती लेकर आती है, बस उसे एंटी-एजिंग क्रीम के नीचे दबाइए मत 😉

बाल रंगने हैं—रंगिए,
वज़न कम रखना है—रखिए,
मनचाहे कपड़े पहनने हैं—पहनिए,
और मौका मिले तो बच्चों की तरह खिलखिलाइए।

लेकिन एक बात साफ़ समझ लीजिए👇
❌ कोई क्रीम गोरा नहीं बनाती
❌ कोई शैम्पू बाल झड़ना नहीं रोकता
❌ कोई तेल जंगल नहीं उगाता
❌ कोई साबुन बच्चों वाली स्किन नहीं देता

चाहे ब्रांड विदेशी हो या स्वदेशी—
सब सामान बेचने के लिए “थोड़ा” झूठ बोलते हैं।
2 ग्राम केसर 500 से ऊपर है, और क्रीम में केसर? 😂
भाई साहब, वो केसर नहीं कल्पना होती है।

नाक मोटी है? कोई बात नहीं।
आंखें छोटी हैं? चलने दें।
रंग गोरा नहीं? फिर क्या हुआ!
सुंदरता आईने में नहीं, एहसास में होती है।

सोशल मीडिया के उपदेश सुनते-सुनते तो इंसान भूखा ही मर जाए—
ये खाओ, वो मत खाओ, नींबू पियो, कपालभाति करो…
आख़िर में ज़िंदगी बोले—मुझे भी जीने दो! 😅

👉 इम्पोर्टेंट बातें:
• हर चीज़ सही मात्रा में खाइए
• थोड़ा चलिए, हल्की कसरत करिए
• शरीर से ज़्यादा मन को सुंदर रखिए
• और याद रखिए—मन को मारकर खुश नहीं रहा जा सकता

क्योंकि साहब,
उम्र बढ़ना कुदरत है,
और खुद को स्वीकार लेना समझदारी। 🌹rao_asgar_ unani physician saharanpur

27/09/2026

سرکہ جات — قدرت کا سادہ مگر زبردست تحفہ 🌿
(सिरका जात — कुदरत का आसान मगर असरदार तोहफा)
✨
روزمرہ زندگی میں استعمال ہونے والے مختلف سرکے — صحت، ہاضمہ اور صفائی کا بہترین ذریعہ
🍏 بازار میں ملنے والے مشہور سرکہ جات:
آج کل مارکیٹ میں کئی اقسام کے سرکے آسانی سے دستیاب ہیں، جیسے:
🔸 سیب کا سرکہ (Apple C***r Vinegar)
🔸 انگور کا سرکہ
🔸 گنے کا سرکہ
🔸 کھجور کا سرکہ
🔸 سفید سرکہ (Synthetic Vinegar)
💚 سرکہ جات کے حیرت انگیز فوائد:
🍽️ ہاضمہ بہتر بنائے:
کھانے کے بعد تھوڑی مقدار میں استعمال معدہ کو طاقت دیتا ہے
🔥 حرارت کم کرے:
جسم کی اندرونی گرمی کو اعتدال میں لانے میں مددگار
🩸 خون کی صفائی:
بدن سے فاسد مادوں کے اخراج میں معاون
⚖️ وزن کنٹرول:
میٹابولزم کو بہتر کر کے وزن کم کرنے میں مدد دیتا ہے
🦠 جراثیم کش خصوصیات:
قدرتی اینٹی بیکٹیریل ہونے کی وجہ سے صفائی اور زخموں میں مفید
💇‍♂️ بالوں اور جلد کیلئے مفید:
بالوں کی خشکی، جلد کی صفائی اور چمک میں معاون
⚠️ احتیاطی تدابیر:
❗ سرکہ ہمیشہ پانی میں ملا کر استعمال کریں
❗ زیادہ مقدار معدے کیلئے نقصان دہ ہو سکتی ہے
❗ خالی پیٹ زیادہ استعمال سے پرہیز کریں
🌿 حکیمانہ مشورہ:
قدرتی اور خالص سرکہ ہی استعمال کریں، کیونکہ اصل فائدہ اسی میں پوشیدہ ہے
📌 یاد رکھیں:
“چھوٹی سی چیز اگر صحیح طریقے سے استعمال کی جائے تو بڑی بیماریوں سے بچا سکتی ہے”
✍️ Rao Asgar Saharanpuri
(Unani Physician)

26/09/2026

🩺 दूसरों का इलाज करने वाले खुद बदहाल क्यों हैं?

6 महीने में 11 मेडिकल कॉलेजों में करीब 12 जूनियर डॉक्टरों, रेजिडेंट डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों की आत्महत्या की खबर।
यह सिर्फ एक आँकड़ा नहीं है।
FIMA की 1,260 रेजिडेंट डॉक्टरों पर की गई स्टडी के मुताबिक—
🔹 87.8% की ड्यूटी के कारण नींद पूरी नहीं होती।
🔹 61.8% ने 36 घंटे से अधिक लगातार काम करने की शिकायत की।
🔹 16.7% ने आत्महत्या के विचार आने की बात कही।
🔹 67.2% में मध्यम और 13% में उच्च तनाव पाया गया।
और दूसरी तरफ़—
जो डॉक्टर दूसरों को जिंदगी बचाने की सलाह देते हैं, वही कई बार अपनी जिंदगी के लिए नींद, आराम और मानसिक सहारे से वंचित रह जाते हैं।
सवाल यह नहीं कि डॉक्टरों को मेहनत नहीं करनी चाहिए।
सवाल यह है कि—
क्या इलाज की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें मरीज की जान बचाने वाला डॉक्टर खुद 30–40 घंटे लगातार काम करने को मजबूर हो?
और अगर डॉक्टर ही थका हुआ, नींद से महरूम और तनाव में होगा, तो
मरीज की सुरक्षा कितनी सुरक्षित रहेगी?
🩺 दूसरों का इलाज करने वालों के लिए भी इलाज, आराम और इंसानी काम की शर्तें जरूरी हैं।
Rao Asgar

26/09/2026

जिनको हार्ट,बीपी, की शिकायत हो वो आती सर्दियों में यूनानी दवाओं से लाभ ले सकते हैं,बाकी दवाएं जो लेते हैं, वो लेते रहे,,free consultation
9358385096

26/09/2026

सेहत और मोबाइल। यूरोप ने बच्चों की डिजिटल दुनिया पर सवाल उठा दिया…
🇮🇳 अब सवाल भारत से है—हम कब जागेंगे? या कब तक सोते रहेंगे।
यूरोप में बच्चों को सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते असर से बचाने के लिए चिंताएं जाहिर की जा रही है। अब सरकार द्वारा EU KIDS Act का प्रस्ताव सामने आ गया है।
प्रस्ताव में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्वतंत्र सोशल-मीडिया अकाउंट पर रोक, 13–15 साल के बच्चों के लिए अभिभावक-नियंत्रित सीमित अकाउंट और प्लेटफॉर्म के addictive design पर भी जिम्मेदारी डालने की बात है।

यानी यूरोप का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि
“बच्चा मोबाइल कितने घंटे चला रहा है?”
सवाल यह भी है कि—
मोबाइल और सोशल मीडिया बच्चे को कितनी देर तक अपने पास रोकने के लिए डिजाइन किए गए हैं?
Infinite scrolling हो, लगातार notifications हों, autoplay हो या ऐसा algorithm जो बच्चे को अगली और अगली चीज दिखाता रहे—अब बहस सिर्फ माता-पिता की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रखी जा रही। बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म को भी दायरे में रखा जा रहा है
और अब ज़रा भारत की तरफ देखिए… 🇮🇳
भारत में भी बच्चों के personal data की सुरक्षा के लिए कानून मौजूद है। DPDP Act में parental consent और बच्चों की tracking तथा targeted advertising पर रोक जैसे प्रावधान हैं।
मगर असली सवाल है—
क्या भारत में भी हम यह पूछेंगे कि सोशल मीडिया कंपनियाँ बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए अपने प्लेटफॉर्म के डिजाइन में क्या बदलाव करेंगी?
या फिर हमेशा की तरह
“बच्चे को मोबाइल मत दो”
कहकर सारी जिम्मेदारी माँ-बाप के सिर डाल देंगे?
थोड़ा व्यंग्य समझिए—
बच्चा अभी स्कूल की किताब पूरी नहीं कर पाया,
लेकिन algorithm उसे बता रहा है कि अगला वीडियो क्या देखना है!
यूरोप कम-से-कम यह सवाल पूछ रहा है कि
बच्चे को बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ माता-पिता की है या उस डिजिटल कारोबार की भी, जो बच्चे का ध्यान अपने प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने से कमाई करता है?
🇮🇳 भारत के नीति-निर्माताओं, अभिभावकों और Meta समेत सभी बड़े प्लेटफॉर्मों से भी यही सवाल है—
क्या भारतीय बच्चे भी बच्चे हैं?
अगर हाँ…
तो उनकी डिजिटल सुरक्षा पर भारतीय बहस भी उतनी ही गंभीर क्यों न हो?
बच्चे सिर्फ भविष्य के मतदाता नहीं,
आज के नागरिक भी हैं—और उनका बचपन किसी algorithm की जागीर नहीं होना चाहिए।

22/09/2026

🩺🌿 जब बीमारी अपनी हो… तो पद्धति नहीं, इलाज याद आता है! see more ...

बड़ी-बड़ी महफ़िलों में एलोपैथी पर उंगली उठाना,
आधुनिक चिकित्सा को कठघरे में खड़ा करना…
और जनता को आयुर्वेद की ताक़त के किस्से सुनाना—
बातें तो बड़ी दिलचस्प हैं साहब!

लेकिन अब पूर्व सांसद #बृजभूषण_शरण_सिंह ने एक ऐसा सवाल उछाल दिया है, जिस पर ठहरकर सोचना बनता है।

उनका दावा है कि बाबा रामदेव अपने हर्निया के इलाज के लिए AIIMS गए, जबकि आचार्य बालकृष्ण के हार्ट ऑपरेशन का भी उन्होंने हवाला दिया।

अब सवाल बीमारी या अस्पताल का नहीं…

सवाल उस ‘यक़ीन’ का है,
जिसका इम्तिहान दूसरों की बीमारी में लिया जाए
और अपनी बारी आए तो आधुनिक चिकित्सा की चौखट पर सिर झुक जाए! 😏

🌿 आयुर्वेद हो,
🩺 यूनानी हो,
💊 एलोपैथी हो—
हर पद्धति की अपनी जगह, अपनी ताक़त और अपनी सीमाएँ हैं।

इल्म की खूबसूरती यही है कि वह अपनी सीमा पहचानता है,
और बाज़ार की खूबसूरती… अक्सर सीमा भूल जाता है।

कहते हैं—

“दूसरों को राह दिखाते रहे उम्र भर,
अपनी बारी आई तो मंज़िल बदल गई…
इलाज सबका अपना-अपना था जनाब,
बस बीमारी ने सारी अकड़ निकाल दी!” 🙂

⚖️ असल सवाल यही है

चिकित्सा पद्धतियों पर सवाल उठाइए,
औषधियों की गुणवत्ता पर बहस कीजिए,
मानक और वैज्ञानिक प्रमाण मांगिए—
मगर फिर वही कसौटी अपने उत्पाद और अपनी पद्धति पर भी लगाइए।

क्योंकि मरीज को भाषण नहीं,
सही और सुरक्षित इलाज चाहिए।

#चिकित्सा #व्यंग्य

20/09/2026

🌿 दवा अपनी जगह… परहेज़ अपनी जगह — मगर बचाव सबसे आगे!
दवा की ताक़त अपनी जगह है। सही बीमारी की सही तश्ख़ीस के बाद मुनासिब दवा इंसान को तकलीफ़ से राहत देती है और बीमारी के इलाज़ में अहम भूमिका निभाती है। लेकिन तिब्ब की असल खूबसूरती सिर्फ़ बीमार होने के बाद इलाज़ करने में नहीं, बल्कि बीमारी को पैदा होने से रोकने में भी है।
यूनानी तिब्ब में हिफ़्ज़ान-ए-सेहत यानी स्वास्थ्य की हिफ़ाज़त को विशेष महत्व दिया गया है। खान-पान में एहतियात, मुनासिब नींद, रोज़मर्रा की शारीरिक गतिविधि, साफ़-सफ़ाई, मानसिक सुकून और मिज़ाज व उम्र के मुताबिक़ जीवनशैली—ये सब सेहत की बुनियाद हैं।
आज हम अस्पताल, मशीनें और दवाएँ बढ़ाने की बात करते हैं—और यह ज़रूरी भी है। लेकिन सवाल यह भी है कि बीमारियाँ इतनी बढ़ क्यों रही हैं?
एक स्वस्थ समाज केवल अस्पतालों से नहीं बनता; वह बनता है सेहत की समझ, सही आदतों और समय रहते सावधानी से।
इलाज तब शुरू होता है जब बीमारी आ चुकी होती है।
लेकिन परहेज़ और हिफ़्ज़ान-ए-सेहत उस मुक़ाम से पहले शुरू हो जाते हैं।
यही सोच इलाज़ को महज़ दवा से उठाकर एक मुकम्मल स्वास्थ्य-दृष्टि बनाती है। 🌿

17/09/2026

💧 एक बात और—पानी में Alkaline यानी pH का क्या मतलब है?

आजकल “Alkaline Water” को लेकर भी बहुत-से दावे किए जाते हैं—कि यह शरीर की acidity खत्म करता है, immunity बढ़ाता है, हड्डियों को मजबूत करता है और कई बीमारियों से बचाता है।

लेकिन विज्ञान थोड़ी अलग तस्वीर पेश करता है।

pH का पैमाना 0 से 14 तक होता है। 7 neutral, 7 से ऊपर alkaline और 7 से नीचे acidic माना जाता है। WHO की drinking-water guidance में pH मुख्यतः पानी की गुणवत्ता, स्वाद, पाइपों पर असर और treatment के संदर्भ में महत्वपूर्ण parameter है; pH को अपने-आप कोई “इलाज” नहीं माना गया है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे खून का pH शरीर स्वयं बहुत कड़ाई से नियंत्रित करता है। केवल alkaline पानी पीने से खून का pH मनचाहे तरीके से alkaline नहीं हो जाता।

2026 की एक वैज्ञानिक समीक्षा में भी पाया गया कि alkaline water के स्वास्थ्य लाभों के प्रमाण अभी सीमित और परिस्थितिनिष्ठ हैं; immunity, anti-aging और अनेक रोगों से बचाव जैसे बड़े दावों के लिए मजबूत clinical evidence उपलब्ध नहीं है।

हाँ, एक महत्वपूर्ण फर्क जरूर है—कुछ alkaline waters में calcium, magnesium और bicarbonate जैसे minerals अधिक होते हैं। ऐसे पानी में संभावित लाभ केवल pH की वजह से नहीं, बल्कि उसके mineral composition की वजह से हो सकते हैं।

इसलिए पानी के मामले में केवल यह पूछना कि “pH कितना है?” काफी नहीं है।

यह भी देखना चाहिए कि पानी में कैल्शियम, मैग्नीशियम और दूसरे minerals कितने हैं तथा आपके क्षेत्र के पानी में कौन-से contaminants मौजूद हैं।

साफ, सुरक्षित और संतुलित पानी—सिर्फ ज्यादा alkaline पानी से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अब बात करते है भारतीय मध्यम परिवारों में उपयोग होने वाले वाटर प्यूरीफायर की तो इसको आप विस्तृत रिपोर्ट और पोस्ट के माध्यम से समझ विकसित कर सकते हैं।
💧 RO का पानी पीने से Vitamin-D की कमी?
सच जानिए, अफ़वाह नहीं!

इन दिनों सोशल मीडिया और कुछ टीवी मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह दावा खूब घूम रहा है कि RO का पानी पीने से शरीर में Vitamin-D की कमी हो जाती है।

लेकिन हकीकत क्या है?

👉 सीधी बात यह है कि RO का पानी Vitamin-D को शरीर से खत्म नहीं करता और न ही Vitamin-D की कमी का सीधा कारण साबित हुआ है।

Vitamin-D मुख्यतः धूप, भोजन और आवश्यकता पड़ने पर सप्लीमेंट से प्राप्त होता है। शरीर की त्वचा सूर्य की UVB किरणों की मदद से Vitamin-D बनाती है।

हाँ, यहाँ एक महत्वपूर्ण बात जरूर है।

🔹 RO की प्रक्रिया पानी से अनेक घुले हुए पदार्थों के साथ कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे खनिजों की मात्रा भी काफी कम कर सकती है। एक प्रकाशित अध्ययन में RO प्रक्रिया से कैल्शियम और मैग्नीशियम में बहुत बड़ी कमी देखी गई।

🔹 WHO ने भी कम-मिनरल/डीमिनरलाइज्ड पानी के लंबे समय तक सेवन में कैल्शियम और मैग्नीशियम की उपलब्धता को महत्वपूर्ण विषय माना है।

और यहाँ Vitamin-D की भूमिका समझना जरूरी है।

Vitamin-D आंतों में कैल्शियम के अवशोषण में मदद करता है। यानी Vitamin-D और Calcium दोनों हड्डियों की सेहत के लिए महत्वपूर्ण हैं।

इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि—

“RO का पानी Vitamin-D की कमी करता है” ❌

जबकि

“बहुत कम-मिनरल वाला RO पानी कैल्शियम और मैग्नीशियम की उपलब्धता को कम कर सकता है, इसलिए पानी की गुणवत्ता और आहार दोनों पर ध्यान देना चाहिए।” ✅

🌿 यूनानी नज़रिए से भी संतुलन जरूरी है।

हर चीज को केवल “फायदेमंद” या “नुकसानदेह” घोषित कर देना तिब्ब की सही सोच नहीं है। पानी की गुणवत्ता उस इलाके के पानी, उसमें मौजूद अशुद्धियों और व्यक्ति की जरूरत पर निर्भर करती है।

अगर आपके इलाके के पानी में TDS, फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट या दूसरे हानिकारक पदार्थ ज्यादा हैं, तो उचित जल-शोधन बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है।

लेकिन साथ-साथ यह भी देखें कि आपका RO पानी को जरूरत से ज्यादा डीमिनरलाइज्ड तो नहीं कर रहा।

💡 व्यावहारिक सलाह

✔️ अपने पानी की गुणवत्ता की जाँच कराएँ।
✔️ RO की जरूरत हो तो उसकी सही सेटिंग और मेंटेनेंस रखें।
✔️ संभव हो तो ऐसे RO सिस्टम पर विचार करें जिसमें remineralization की सुविधा हो।
✔️ Calcium और Magnesium के लिए दूध/दही, तिल, हरी सब्जियाँ, दालें और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ अपने आहार में शामिल करें।
✔️ Vitamin-D के लिए पर्याप्त धूप और भोजन पर ध्यान दें।
✔️ यदि Vitamin-D की कमी का संदेह हो तो 25-OH Vitamin-D blood test से स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।

निष्कर्ष:
RO को खलनायक बनाना भी गलत है और उसे हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य बताना भी।

साफ पानी जरूरी है—लेकिन संतुलित पानी और संतुलित आहार भी उतने ही जरूरी हैं।

— Rao Asgar
Unani Physician & Health Educator, Saharanpur

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