Avinoshoshishya
Osho lover, Meditator and councellor
जीना अलग है
जानकारी के पीपे पर पीपे पीना अलग है
चतुर और पढ़े और लिखे
हमने जिस तरफ देखा
उसी तरफ हमें दिखे
मगर अपने जाने हुए के मुताबिक रहते हुए
याने शरीर के हुकुम पर न बहते हुए कम ही दिखे
इसलिए भाई, पढ़े भाई, लिखे भाई, अकड़ो मत
कोरे शब्दों की फांसी में अपने को जकड़ो मत
शास्त्र सुंदर है; छाती पर नहीं बैठ जाना चाहिए। गीता को पढ़ो एक काव्य की तरह। वेद को गुनगुनाओ गीतों की भांति। कुरान को उठने दो संगीत की भांति। लेकिन ध्यान रखना, ज्ञान का दावा न आए। ज्ञान का दावा अटकाता है।
तुम बंजर हो जाओगे
यदि इतने व्यवस्थित ढंग से रहोगे
यदि इतना सोच-समझ कर
बोलोगे-चलोगे,
कभी मन की नहीं कहोगे
सच को दबा कर झूठे प्रेम के गाने गाओगे
तो मैं तुमसे कहता हूं तुम बंजर हो जाओगे।
ज्ञानी बंजर हो जाते हैं। फिर उनके जीवन में न कोई फूल लगते, न फल। और पुण्यात्मा भी बंजर हो जाते हैं। और तुम्हारे महात्माओं में सिवाय दावे के और कुछ भी नहीं बचता। एक थोथी अकड़ बचती है।
धर्म की राह पर चलने वाला सच्चा आदमी पापी जैसा विनम्र होगा, अज्ञानी जैसा निर्दोष होगा। और जहां पापी जैसी विनम्रता, अज्ञानी जैसा निर्दोषपन है, वहां मिटने की यात्रा शुरू हो गई। वहां तुम्हारी बर्फ पिघलने लगी, तुम गलने लगे; सूरज उगने लगा, सुबह होने लगी। जल्दी ही तुम पाओगे सूरज सारे आकाश पर छा गया है, और तुम्हारा कहीं कोई पता भी नहीं है।
OSHO ❤️
Jyoti Se Jyoti Jale 15
सामरसेट मॉम के भतीजे ने, रॉबिन मॉम ने एक किताब लिखी है: कनवरसेशंस विद मॉम। सामरसेट मॉम इस सदी के प्रसिद्ध से प्रसिद्ध लेखकों में एक था और सबसे ज्यादा धनी लेखकों में भी। जब मैं इस अंश पर आया तो बहुत चौंका। उसके भतीजे ने एक दिन सामरसेट मॉम से पूछा: आपके जीवन की सबसे सुखद स्मृति क्या है? मॉम हकलाए और कहा: ऐसा. ऐसा कोई भी क्षण मैं याद नहीं कर पाता हूं। भतीजा चौंका!
मॉम का लंबा जीवन सफलता ही सफलता की कहानी है। यश के एक सोपान से दूसरे सोपान पर चढ़ने की कहानी है। जगत-ख्याति, जैसी किसी दूसरे लेखक की इस पूरी सदी में नहीं! और मॉम कहे कि ‘ऐसा कोई भी क्षण मैं याद नहीं कर पाता हूं जिसे मैं जीवन की सुखद स्मृति कहूं!’
भतीजे ने लिखा है: मैंने दीवानखाने में चारों ओर सजे हुए कीमती फर्नीचर, सजावटी सामान, कीमती पेंटिंग्स आदि पर नजर डाली, जो मॉम की सफलता के प्रतीक थे। इससे ज्यादा सुंदर सजा हुआ महल शायद पृथ्वी पर दूसरा हो! मुझे याद आया कि भूमध्य सागर के किनारे स्थित उनका यह महल और इसके साथ लगे बगीचे का मूल्य छह लाख पौंड है, करीब एक करोड़ रुपया। मॉम के पास ग्यारह नौकर थे जो सदा चौबीस घंटे उनकी सेवा में तत्पर रहते थे। वे ठोस सोने की रकाबियों में भोजन करते थे। हीरे-जवाहरात जड़ी हुई चीजों का उनके पास अंबार था।
भतीजा भरोसा भी न कर पाया। लेकिन उसने उस दिन बात वहीं छोड़ दी। दूसरे दिन दोपहर को, भतीजे ने लिखा है कि मैंने देखा कि वे सोफे पर अधलेटे हुए, बहुत मोटे टाइप में छपी बाइबिल के पन्ने पर नजर गड़ाए हुए कुछ पढ़ रहे हैं। आंखें उनकी कमजोर हो गई थीं और केवल मोटे-मोटे अक्षरों में छपी हुई किताब ही वे पढ़ सकते थे। और अंतिम दिनों में सिवाय बाइबिल के और वे दूसरी किताब पढ़ते भी नहीं थे। उनका चेहरा बहुत गंभीर था। उन्होंने मुझसे कहा: तुमने यह बाइबिल भेजी थी न, इसमें मैंने यह वाक्य पाया है: मनुष्य समूचा संसार पा ले, मगर अपनी आत्मा गंवा बैठे तो भला उसने हासिल क्या किया? जीसस का प्रसिद्ध वचन है।
और मॉम ने कहा: मेरे प्यारे रॉबिन! मैं तुम्हें बताता हूं कि जब मैं छोटा बच्चा था, यह वाक्य मेरे बिस्तर के पास टंगा रहता था। लेकिन तब मैं इसका अर्थ न समझा और पूरा जीवन गंवा बैठा; जानते हो, जब मैं मरूंगा, ये सारी चीजें मुझसे छिन जाएंगी। ये बगीचे, इस बगीचे का एक-एक पेड़, यह समूचा महल, यह फर्नीचर, यह फर्नीचर का हर हत्था और पाया। मैं तुमसे कहता हूं कि एक मेज भी मैं अपने संग न ले जा सकूंगा; मैं सरासर असफल आदमी रहा हूं, सारे जीवन सब तरह से असफल!
वे बोले: मैं गलती पर गलती करता रहा। मैं सब कचरा कर बैठा। और जब मैं छोटा बच्चा था तो मेरे झूले के पास यही वाक्य टंगा हुआ था: मनुष्य समूचा संसार पा ले, मगर अपनी आत्मा गंवा बैठे, तो भला उसने हासिल क्या किया?
भतीजे ने उन्हें ढाढ़स बंधाने की कोशिश की और कहा: छोड़िए भी, आज आप जिंदा लेखकों में सबसे नामी हैं। आपकी यश-पताकाएं सारी पृथ्वी पर सारी भाषाओं में फहरा रही हैं। ऐसी कोई भाषा नहीं दुनिया की, जिसमें आपकी किताबों के अनुवाद न हुए हों, जहां लोग आपको जानते न हों, जहां आपका सम्मान न हो। इसका कुछ तो अर्थ होगा?
सामरसेट मॉम ने कहा: काश, मैंने एक भी अक्षर न लिखा होता। इस चीज ने बस मुझे दुख ही दुख दिया है। जो भी मेरा परिचित हुआ, अंत में मेरा द्वेषी बन गया। मेरा सारा जीवन विफल रहा है। पर अब बहुत विलंब हो चुका, अब मैं बदल नहीं सकता। अब बहुत देर हो चुकी। और मैं तुमसे फिर कहता हूं कि जब मैं छोटा बच्चा था तो मेरे झूले के पास ही यह वचन टंगा हुआ था: मनुष्य समूचा संसार पा ले, मगर अपनी आत्मा गंवा बैठे तो भला उसने हासिल क्या किया? लेकिन अब बहुत देर हो चुकी, अब बहुत विलंब हो चुका, अब मैं बदल न सकूंगा।
इसके कुछ ही दिन, कोई तीन या चार दिन बाद सामरसेट मॉम की मृत्यु हो गई।
ये सफल आदमियों की कहानियां हैं! ये पद पर पहुंचे हुए लोगों की कथाएं हैं!
नहीं, पद की भाषा बोलो ही मत, नहीं तो अहंकार बड़ा चालबाज है। वह ‘पद’ शब्द पर सवारी कर लेगा। वह उसका घोड़ा बना लेगा। चले तुम! अहंकार ने कहा कि ठीक है, समाधि पा कर रहेंगे, सिद्ध होकर रहेंगे, बुद्ध होकर रहेंगे!
एक युवक ने बुद्ध के चरणों में जाकर सिर रखा और कहा कि मैं कसम लेकर आया हूं कि बुद्ध होकर ही जाऊंगा। बुद्ध ने कहा: मुश्किल हो गई तब, यही बात बाधा बन जाएगी। छोड़ दे, यह बात छोड़ दे। यह कसम किसने खाई है? जिस अहंकार ने यह कसम खाई है, वही तो बाधा है। तू जिस अहंकार से यह संकल्प लिया है, वही तो दीवाल है।
बुद्धत्व तब आता है, जब कुछ भी मन में बनने का भाव नहीं रह जाता। कुछ भी बनने का भाव नहीं रह जाता! बुद्ध बनने का भाव भी नहीं रह जाता! समाधि तब फलती है जब समाधि तक को पाने की कोई आकांक्षा नहीं रह जाती। जब अभीप्सा मात्र समाप्त हो जाती है। जब जो जहां जैसा है वैसे से ही राजी हो जाता है, परम राजी, संतुष्ट। जब परितोष इतना सघन होता है कि अब कुछ भी करने की जरूरत नहीं, न कुछ होने की जरूरत है।. उसी घड़ी, उसी शुभ घड़ी में परमात्मा उतर आता है।
परितोष की घड़ी में परमात्मा का आगमन होता है। पदाकांक्षी--फिर चाहे पद संसार के हों और चाहे परलोक के, भेद नहीं है--पदाकांक्षी कभी नहीं पहुंच पाता। पदाकांक्षी भटकता ही रहता है।
तुम पूछते हो: ‘आप इस पद पर कैसे पहुंचे?’
यह पद नहीं है। यहां भीतर मेरे मैं जैसा कुछ नहीं है। पहुंचने वाला समाप्त हो गया तब पहुंचना होता है।
‘हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराइ।’ खोजते-खोजते जब खोजने वाला भी खो जाता है, तब मिलन है, तब परम मिलन है।
OSHO ❤️
Jyoti Se Jyoti Jale 14
परमात्मा की प्रार्थना तो कठिन है। कठिन इसलिए है कि दिखाई भी नहीं पड़ता, उससे बात भी करें तो कैसे करें? न उसकी तरफ से कोई उत्तर आता मालूम पड़ता है।
मुश्किल यह है
तुमसे बात करते समय
कि तुम दिखते नहीं हो
और जिससे बोल रहे हैं हम
अगर वह दिखता नहीं है
तो उत्साह बात करने का ठंडा
पड़ जाता है
अंदाज तो लगना चाहिए
कि हम जो कुछ कह रहे हैं
वह सुना भी जा रहा है या नहीं
सुना जा रहा है अगर
तो अच्छा या बुरा
कोई न कोई उसका असर
सुनने वाले पर पड़ रहा है या नहीं
तो यह मेरी मुश्किल अगर हो तुम कहीं
तो किसी तरह हल करो
याने जब लगे तुम्हें कि
कुछ ठीक कह रहा हूं
तो एकाएक खिला दो मेरे
पास के पौधे पर एक
हंसता हुआ फूल
और जब लगे मैं बहक रहा हूं
तो कह दो किसी अपने पंछी से
कि उड़ कर मेरे सिर पर से
थोड़ा सा चहक जाए
और लगे कि ऐसी बातें
मुझे करनी ही नहीं चाहिए
तो तेज कर दो
मेरे ऊपर पड़ रही धूप को
इसी तरह समझ लिया करूंगा मैं
तुम्हारे प्रसन्न या अप्रसन्न
या सावधान करने वाले रूप को!
परमात्मा से बात कैसे हो? हम कहे चले जाते हैं, कोरा आकाश सुने चला जाता है; न कोई उत्तर आता है, न कुछ पता चलता है कि हमारी बात पहुंची भी या नहीं पहुंची? हमारी बात का कोई परिणाम भी हुआ या नहीं? दूसरी तरफ कोई है भी या नहीं?
प्रार्थना इसीलिए असंभव बात है। लेकिन सदगुरु से प्रेम संभव है। और वही प्रार्थना का पहला चरण है। पहले उससे जुड़ो, जिससे जुड़ने की कोई सुविधा है; जिससे बात हो सकती है, संवाद हो सकता है; जिसकी आंखों में उठते भाव समझ में आ सकते हैं; जिसकी आंखों में खिलते फूल; तुम्हारी बात का क्या परिणाम हुआ, इसकी झलक दे जा सकते हैं; जिसका हाथ तुम्हारे सिर पर पड़े, जिसका आशीष तुम पर बरसे तो लगता है कि बात सुनी गई, पहुंची। जिससे प्रत्यक्ष कुछ नाता हो सके।
सदगुरु से प्रेम का अर्थ होता है: हमने परमात्मा की तरफ पहला कदम उठाया। अभी तो हम परमात्मा को भी रूप में चाहेंगे। आकार में चाहेंगे, सगुण चाहेंगे। तुम देखते हो न, सारी दुनिया में ज्ञानियों ने निर्गुण की बात की है लेकिन फिर भी मंदिर बनते हैं, मूर्तियां स्थापित होती हैं। सगुण मिटता नहीं। ज्ञानी लाख सिर पटके कि परमात्मा निर्गुण है, सगुण की भक्ति जारी रहती है। इसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक कारण है। निर्गुण की बातचीत से संबंध नहीं जुड़ता आदमी का। वह पत्थर की मूर्ति बना लेता है, कोई तो हो जिससे बात हो सके। पत्थर की मूर्ति के आस-पास नाच लेता है। इतना तो अहसास होता है कि चलो हम किसी के पास नाचे! पत्थर की मूर्ति की आरती उतार लेता है, फूल चढ़ा देता है, सिर झुका लेता है।
मनुष्य स्थूल है, उसे कुछ स्थूल चाहिए। लेकिन पत्थर की मूर्ति से कुछ हल न होगा। पत्थर की मूर्ति को भी तुम गौर से देखोगे तो वह भी कोई उत्तर नहीं देती। आंखें उसकी पथराई हैं सो पथराई हैं। पत्थर की मूर्ति भी तुम्हारा कुछ सुनती नहीं। पत्थर की मूर्ति से भी कोई प्रत्युत्तर नहीं आता, न आ सकता है।
गुरु निर्गुण और सगुण के बीच में खड़ा है। उसका कुछ हिस्सा सगुण है, कुछ हिस्सा निर्गुण है। कुछ तुमसे जुड़ा है, कुछ परमात्मा से। एक हाथ तुम्हारे हाथ में, एक हाथ परमात्मा के हाथ में। तुम्हें तो परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता, लेकिन गुरु का जो एक हाथ दिखाई पड़ता है, अगर तुम पकड़ लो तो तुम्हारा भी हाथ अनजाने ही, परोक्ष रूपेण परमात्मा के हाथ में पड़ गया। क्योंकि गुरु का हाथ परमात्मा के हाथ में है। गुरु सेतु है।
मात पिता सबही मिलैं भइया बंधु प्रहसंग।
सुंदर सुत दारा मिलैं दुर्लभ है सतसंग।।
OSHO ❤️
Jyoti Se Jyoti Jale 13
भगवान, आप हमें अक्सर समझाते हैं कि मन की बजाय हृदय की सुनो। लेकिन कोई कैसे जाने कि उसके मन की आवाज कौन है और उसके हृदय की आवाज कौन है? कुछ समझाने की अनुकंपा करें।
रेणुका! बात बिलकुल सीधी-साफ है। जरा भी उलझन नहीं है।
मन सदा बाहर की तरफ ले जाने के इशारे करता है, हृदय सदा भीतर की तरफ ले जाने के इशारे करता है। जब कोई तुम्हारे भीतर बोले कि चलो बाहर, धन कमाओ, पद कमाओ, प्रतिष्ठा, महत्वाकांक्षा. तो समझना मन बोला; क्योंकि हृदय की ये आकांक्षाएं नहीं हैं। जब कोई कहे कि बैठो चुप, आंखें बंद करो, डूबो अपने में, डुबकी मारो अपने अस्तित्व में, अपने प्राणों की सुनो, भीतर जो नाद उठ रहा है उसमें पगो--तो जानना कि हृदय बोला है।
अंतर्यात्रा हृदय की सूचना है; बहिर्यात्रा मन की। इसमें भूल का कोई कारण नहीं। जब द्वेष उठे तो जानना कि मन बोला और जब प्रेम उठे तो जानना कि हृदय बोला। जब विचार घेर लें तो जानना कि मन ने पकड़ा, और जब भावों की तरंगें उठें तो जानना कि हृदय में हो। जब नकार उठे, नहीं कहने का मन हो, संदेह उठे, तो जानना कि मन बोल रहा है। क्योंकि मन का अस्त्र है नकार। जब अकार उठे, स्वीकार उठे, श्रद्धा उठे, तो जानना कि हृदय बोला। कठिनाई नहीं होगी।
चीजें बिलकुल साफ-साफ हैं। उतनी ही साफ-साफ, जैसे सिर में दर्द होता है तो तुम्हें पता चलता है सिर में दर्द है और पैर में कांटा गड़ता है तो तुम्हें पता चलता है कि पैर में कांटा गड़ा है। इतनी ही साफ-साफ हैं। शायद बाहर तुम किसी को समझा न पाओ। कोई अगर पूछे कि कैसे तुम्हें पक्का होता है कि पेट में दर्द है कि सिर में दर्द है? क्या लक्षणा है? तो तुम कहोगे: लक्षणा की कोई जरूरत नहीं, मुझे पता चलता है कि सिर में दर्द है या पेट में दर्द है। इसमें लक्षणा की क्या जरूरत है? तुम डॉक्टर के पास जाओ और कहो कि मेरे सिर में दर्द है। वह कहे: पहले सिद्ध करो। तुम्हें कैसे पता चला? अगर कोई जोर देकर तुमसे पूछे कि तुम्हें कैसे पता चले, तो तुम्हें भी बहुत संदेह पैदा होने लगेगा कि पता नहीं पेट में है कि सिर में है? कोई अगर बहुत तुम्हें उलझाए, तो झंझट में डाल दे सकता है। लेकिन भीतर स्वर बिलकुल साफ होते हैं।
इतनी ही साफ होती है बात हृदय की और मन की। जरा भी विभ्रम का कारण नहीं है। लेकिन विभ्रम पैदा हुआ है। और मैं समझा कि रेणुका का प्रश्न सार्थक है। बहुत लोगों को यह झंझट खड़ी होती है--कैसे समझें? पुरुषों को यह अक्सर हो जाता है कि वे मन को ही हृदय समझ लेते हैं। और स्त्रियों को अक्सर यह हो जाता है, वे हृदय को ही मन समझ लेती हैं। इसलिए पुरुष और स्त्रियों के बीच संवाद बड़ा मुश्किल होता है। पति-पत्नी के बीच संवाद कभी देखा है? होता ही नहीं। विवाद होता है, बोले कि विवाद। धीरे-धीरे पति सीख ही लेता है कि बोलना ही नहीं।
OSHO ❤️
Jyoti Se Jyoti Jale 12
सौंदर्य का जन्म आदमी की आंखों में है
आकाश की शून्यता पंछी की पांखों में है
अगर आदमी खूबी न देखे तो सब खराब है
अगर पंछी न उड़े तो आकाश एक बड़ा घाव है
घोंसले की छाती का जो भर नहीं सकता
पंछी अगर उड़े तो आकाश
उसका कुछ कर नहीं सकता
आज के उदास सिद्धांतों को चीर डालो
हिम्मत के तरकश में आशा के तीर डालो
हर अंधेरे में दीपक जलाओ
हर अमावस में दीवाली मनाओ
गले में अगर गीत है तो गाओ
चुप्पी की सांस टूट जाए उसे ऐसा उठाओ
उदार बनो, इतना मत परखो साथियों को
कसौटी पर नहीं कसते हैं पगले, बातियों को
वे तो स्नेह में डुबा कर सुलगा दी जाती हैं
इतना करो, वे तुम्हारे खातिर खुशी से जलेंगे
दूर-दूर तक तुम्हारे साथ अंधेरे में चलेंगे
जिंदगी आज की भी मीठी है, चखो
शर्त एक ही है भाई
दांतों को साफ और मजबूत रखो।
तुम्हारे भीतर की पचाने की क्षमता प्रगाढ़ हो।
शर्त एक ही है भाई
दांतों को साफ और मजबूत रखो।
परमात्मा को पचाने की क्षमता, परमात्मा को चबाने की क्षमता, परमात्मा को पी जाने की क्षमता! तुम्हारे भीतर संवेदनशीलता बड़ी से बड़ी होती चली जाए। तुम्हारा पात्र बड़ा से बड़ा होता चला जाए।
तुम शून्य बनो, पूर्ण अपने से आएगा। लोग पूर्ण की तलाश में निकल जाते हैं, इसकी फिकर बिना किए कि हम अभी शून्य नहीं हैं। और जिंदगी को ऐसा बांटो भी मत कि यह साधु है वह असाधु है, यह सुंदर वह असुंदर, यह सत्य वह झूठ। जिंदगी तो एक है, कौन साधु कौन असाधु, कौन सुंदर कौन असुंदर? जिन्होंने जाना है, उन्होंने सर्वांग को सुंदर पाया है। जिन्होंने जाना है, उन्होंने सारे अस्तित्व को परमात्ममय पाया है। उन्होंने राम में तो देखा ही है, रावण में भी देखा है।
OSHO ❤️
Jyoti Se Jyoti Jale 12
लुहार को देखा है, लोहे को गर्म करता है, सुर्ख करता है--आग जैसा! और फिर दो लोहे के टुकड़ों को मिला देता है। ऐसा ही इस जीवन का उपयोग कर लो। जीवन एक ऊर्जा है, एक गर्मी है। अगर चाहो तो यह परमात्मा से मिल सकती है। लेकिन अभी। ठंडा होकर नहीं मिल पाएगी।
अक्सर लोग बुढ़ापे की राह देख रहे हैं, तब सोचते हैं परमात्मा की याद करेंगे। तब लोहा ठंडा हो जाएगा। कुछ लोग तो सोचते हैं, जब मर रहे होंगे बिलकुल, बिस्तर पर पड़े होंगे, तभी कर लेंगे याद, इतनी जल्दी क्या है? अभी तो भोग लें, चार दिन का राग-रंग देख लें। मरते वक्त लोग गंगाजल पिलाते हैं। वह आदमी मर रहा है, उसे अब कुछ होश भी नहीं कि तुम क्या पिला रहे हो। मरते आदमी को लोग वेदों का पाठ सुनाते हैं। उसे कुछ सुनाई नहीं पड़ता अब। उसके कान डूबे जा रहे हैं। जब जिंदगी गरम हो, जब जिंदगी युवा हो, तभी खोज लेना।
मेरे पास लोग आ जाते हैं। वे कहते हैं: आप युवकों को संन्यास दे देते हैं। मैं उनसे कहता हूं: संन्यास मूलतः युवक का ही गुणधर्म है। क्योंकि जब लोहा गर्म हो, जब जीवन तप्त हो और ऊर्जा से भरा हो, जब जीवन में तूफान की क्षमता हो, जब जीवन में अन्वेषण का उपाय हो, जब अभियान करने के लिए चुनौती स्वीकार करने का साहस हो, तभी! ठंडे हो गए तब, मुर्दा हो गए तब, फिर? फिर तुम तो राम-राम न कह पाओगे, दूसरे लोग कहते हैं। ले चले अरथी पर रख कर तुमको। ले जाएंगे लोग अरथी पर रख कर तुमको। वे कहेंगे, राम-नाम सत्य है। और इन सज्जन ने जिंदगी भर न कहा राम-नाम सत्य है। यह भी खूब मजा है! जिंदगी थी, तब राम-नाम सत्य नहीं था; तब और सब चीजें सत्य थीं, राम-नाम को छोड़ कर। अब मर गए, अब लोग चिल्ला रहे हैं--दूसरे, कि राम-नाम सत्य है। वे भी अपने लिए नहीं कह रहे हैं; तुम्हें ठंडा करके घर लौट कर वे भी उसी को सत्य कहेंगे जिसको तुम जिंदगी भर सत्य कहते रहे। वे भी प्रतीक्षा करेंगे कभी फिर कोई चार आदमी उनको उठाएंगे, तब वे कह देंगे राम-नाम सत्य है। राम को तुमने उधार छोड़ रखा है?
OSHO ❤️
Jyoti Se Jyoti Jale 09
13/09/2026
भगवान, आपने हजारों को अपने रंग में रंग दिया है, इसके पीछे जादू क्या है?
जादू परमात्मा का है, मेरा उसमें कुछ भी नहीं है। जहां तक मेरा-तेरा है, वहां तक जादू आता ही नहीं। जहां मेरा-तेरा गया, वहीं से जादू की शुरुआत है।
वही रंग रहा है। रंग उसका है।
मैंने सुना है, एक आदमी दस वर्ष से लकवे का मरीज था, बिस्तर पर पड़ा था। लकवे के मरीज अक्सर ही निन्यानबे प्रतिशत मानसिक मरीज होते हैं। दस साल से उठा नहीं, चला नहीं, बैठा नहीं। एक दिन घर में आग लग गई, आधी रात घर के लोग बाहर भागे। वह आदमी भी भाग खड़ा हुआ। वह उठता ही नहीं था, चलता ही नहीं था, बैठता ही नहीं था। अब घर में आग लगी हो तो कौन फिकर करता है लकवे की! यह कोई वक्त है लकवे की सोचने का? ये तो सब सुख-सुविधा की बातें हैं। याद ही न रही कि मैं लकवे का मरीज हूं! फुर्सत कहां थी! इतना समय कहां था! रात आधी नींद में जगाया गया, घर में आग लगी है, सब भाग रहे हैं। एक तो नींद, आधी रात, अचानक जाग गया। कभी-कभी तुम्हें भी लगा होगा, एकदम अचानक कोई जगा दे तो तुम्हें समझ में नहीं आता, तुम कौन हो; समझ में नहीं आता, तुम कहां हो। जरा देर लगती है। और फिर आग लगी हो, तो और मुश्किल हो गई। वह भाग ही गया। जब बाहर पहुंच गया और भीड़ ने उसे भागते देखा तो लोगों ने पूछा: अरे! यह क्या? आप तो लकवे के मरीज हैं। वहीं गिर पड़ा! जैसे ही खयाल आया. लकवे का मरीज!
जंजीरें! कैसी जंजीरें! किसने तुम्हें बांधा है? सब जंजीरें झूठी हैं। तुम सच मानो तो सच हैं।
गुरजिएफ ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि कॉकेसस पहाड़ के पास रहने वाला एक कबीला अपने छोटे बच्चों को. कबीले का जीवन जरा संघर्ष का और कठिन है, पुरुषों को भी जंगल में मेहनत करने जाना पड़ता है। लकड़ियां काटो, शिकार करो। स्त्रियों को भी जाना पड़ता है। बच्चों को छोड़ देना पड़ता है। छोटे-छोटे बच्चे! जिंदगी जरा मुश्किल है, सुविधापूर्ण नहीं है। तो उन्होंने एक तरकीब निकाल ली है, जिसका वे हजारों साल से उपयोग कर रहे हैं। वह तरकीब यह है कि छोटे बच्चे के चारों तरफ चाक से एक लकीर खींच देते हैं और बच्चे को कह देते हैं, इसके बाहर नहीं निकलना, कोई निकल ही नहीं सकता इसके बाहर! यह इतने बचपन से कही जाती है बात कि इसका भरोसा आ जाता है। यह एक तरह की हिप्नोसिस है, एक तरह का सम्मोहन हो जाता है। फिर बच्चा और बच्चों को भी देखता है, घर में सब अपनी-अपनी लकीरों में बंद हैं, सब अपनी लकीरों में बैठे हैं। बस लकीर तक आ सकते हैं। वहीं खेलते हैं, कूदते हैं; मगर लकीर के बाहर नहीं निकलते। लकीर के बाहर कोई निकल ही नहीं सकता है!
जब गुरजिएफ पहली दफा कॉकेसस के इन पहाड़ों में गया, तो वह चकित हुआ। बड़े आदमी के पास, जवान आदमी के पास लकीर खींच दो और कह दो कि इसके बाहर नहीं जा सकते, वह नहीं जा सकता। वह जा ही नहीं सकता! अगर कोशिश करेगा तो लकीर के पास जैसे कोई अदृश्य दीवाल उसे धक्के मार कर भीतर भेज देती है। वह अदृश्य दीवाल कहीं भी नहीं है; पर उसके मन में, उसकी मान्यता में.
अगर तुमने सम्मोहन के संबंध में कुछ कभी समझा है तो तुम चकित हो जाओगे। किसी को सम्मोहित कर दो। और सम्मोहित करना बड़ी सरल बात है। बस कोई राजी भर हो, तुम पर भरोसा भर करता हो, तुम उससे कहना कि जरा पांच मिनट तक बिना आंख को झपके बिजली के बल्ब को देखते रहो और तुम उसके पास बैठ कर कहते जाना कि बेहाशी आ रही है, बेहोशी आ रही है, बेहोशी आ रही है, बेहोशी आ रही है। और दस आदमियों पर प्रयोग करोगे तो तीन पर सफल हो जाओगे, क्योंकि तैंतीस प्रतिशत लोग हमेशा तैयार हैं सम्मोहित होने को। ये ही तैंतीस प्रतिशत लोग दुनिया के सब उपद्रव चलवाते हैं। ये आधारशिला हैं। ये दुनिया भर की राजनीति चलवाते हैं। इन्हीं के कारण हिटलर जैसे लोग पैदा हो जाते हैं। ये तैंतीस प्रतिशत लोग किसी के भी चक्कर में आने को तैयार होते हैं। ये आतुर होते हैं कि कोई चक्कर डाले। इन्होंने दुनिया को बड़े कष्ट में डाला है। और ये बुरे लोग नहीं हैं--सीधे-सादे भले लोग हैं।
पांच मिनट के बाद जब उस आदमी की आंखें झपकने लगें, तब तुम समझ लेना, उसके चेहरे का भाव बदल जाएगा। एकदम से चेहरा निस्तेज हो जाएगा। वह जो चेहरे पर थोड़ा जीवन मालूम होता था, वह क्षीण हो जाएगा। जब चेहरा बिलकुल निस्तेज हो जाए, जैसे मुर्दे का हो गया है, तो उस आदमी को कहना कि अब तुम लेट जाओ, तुम बिलकुल बेहोश हो गए। अब इस बेहोशी की हालत में तुम उससे जो कहोगे वह मानेगा। तुम अगर उसके हाथ पर एक साधारण कंकड़ उठा कर रख दोगे और कहोगे कि यह अंगारा है तो वह चीख मार कर कंकड़ को फेंक देगा। इसमें बहुत आश्चर्य नहीं है कि उसने चीख मार कर अंगारा फेंक दिया, आश्चर्य तो तब तुम्हें होगा जब उसके हाथ पर फफोला उठ आएगा। इतना मन मान लेता है कि हाथ पर फफोला आ जाता है!
इसकी ही उलटी प्रक्रिया है, जो लोग आग पर चलते हैं, कुछ भिन्न नहीं है, सम्मोहन की ही प्रक्रिया है। इससे उलटी प्रक्रिया है। उसमें जरा और गहरा सम्मोहन चाहिए। और गहरा सम्मोहित आदमी हो, उसके हाथ पर अंगारा रख दो और कहो कि यह साधारण कंकड़ है, ठंडा कंकड़, और हाथ नहीं जलेगा।
मन जो मान लेता है वैसा हो जाता है। मन की बड़ी क्षमता है।
तुम किन जंजीरों की बातें कर रहे हो? वे जंजीरें तुम्हारे मन की मानी हुई हैं। सोचते होओगे कि पत्नी है, बच्चा है। कौन किसका है! सोचते होओगे कि गांव में प्रतिष्ठा है, नाम है। लोग क्या कहेंगे कि तुम और नाचने लगे दीवाने की तरह! अच्छे-भले गए थे, यह तुम्हें क्या हो गया? मगर प्रतिष्ठा, नाम, यश सब तुम्हारी मान्यता है।
आहे-जांसोज की महरूमी-ए-तासीर न देख।
हो ही जाएगी कोई जीने की तदबीर न देख।।
हादसे और भी गुजरे उल्फत के सिवा।
हां मुझे देख मुझे अब मेरी तस्वीर न देख।।
ये जरा दूर पे मंजिल ये उजाला ये सुकूं।
ख्वाब को देख अभी ख्वाब की ताबीर न देख।।
देख जिंदां से परे रंगे-चमन जोशे-बहार।
रक्स करना है तो फिर पांव की जंजीर न देख।।
नाचना है तो फिर पांव की जंजीर न देख!
देख जिंदां से परे रंगे-चमन जोशे-बहार।
जिस कारागृह में तुम बंद हो, उसकी तरफ तुम्हारी आंखें उठाने के लिए पुकार रहा हूं, कि जरा आंखें खोलो, जरा आंखें ऊपर उठाओ!
देख जिंदां से परे रंगे-चमन जोशे-बहार।
बसंत आया हुआ है। फूल खिले हुए हैं। पक्षी मदमस्त हैं। सारा अस्तित्व रस-विमुग्ध है।
देख जिंदां से परे रंगे-चमन जोशे-बाहर।
रक्स करना है तो फिर पांव की जंजीर न देख।।
और नाचना है तो फिर पांव की जंजीर देखो ही मत। और मैं तुमसे कहता हूं और मैं तुम्हें आश्वासन देता हूं कि अगर तुम नाचे तो पांव की जंजीर पायल बन जाएगी। मैंने पांव की जंजीर को पायल बनते देखा है, इसलिए कहता हूं। ये तुम्हीं थोड़े ही पहली दफा यहां आए हो, यहां सभी इसी तरह आते हैं और सभी जंजीरों से भरे आते हैं। और फिर नाचने लगते हैं तो चकित हो जाते हैं: वही जंजीर जो कल रोकती थी, नाच में ताल देने लगती है। वही जंजीर, जो कल जंजीर थी, पायल बन जाती है। उसकी रुनझुन से गीत प्रकट होने लगते हैं।
लेकिन तुमने अभी जरा-जरा चखा, इसलिए प्रश्न उठ रहे हैं। थोड़ा और पीओ। थोड़े और करीब आओ। थोड़ी और मस्ती में डूबो। यहां मैं तुम्हें उदासी सिखाने के लिए नहीं बैठा हूं। यहां मैं तुम्हें जीवन का रस सिखाना चाहता हूं। मैं नहीं चाहता कि मेरे संन्यासी उदास दिखें, विरक्त दिखें। मैं चाहता हूं, मेरे संन्यासी परमात्मा पर आसक्त दिखें, परमात्मा के प्रति रस-भरे हों। और यह जगत भी उसका है और यह जगत उसकी ही छाया है। इसलिए इस जगत के प्रति भी रस-भरे हों।
तुम नाचो, तुम्हारी जंजीरें भी नाचेंगी। तुम नाचो, तुम्हारी पत्नी भी कभी नाचेगी, तुम्हारे बच्चे भी कभी नाचेंगे। तुम नाचना तो शुरू करो! यह संक्रामक है, यह फैलता चला जाता है।
OSHO❤️
Jyoti Se Jyoti Jale 06
भगवान, मैं आपका शिष्य हूं, आप हैं मेरे गुरु--इसे सारे जगत से कहना चाहता हूं,पर कह नहीं पाता हूं। क्या करूं?
इसे मौन अनुभव ही रहने दो। इसे कहने की कोई जरूरत भी नहीं है। नहीं तो अहंकार उपजेगा। क्यों कहना चाहते हो? क्या प्रयोजन है? अगर तुम शिष्य हो तो जगत जान ही लेगा।
फूल खिलते हैं, सुगंध पहुंच ही जाती है नासापुटों तक। सूरज निकलता है--बिना किसी दुदुंभि के, बिना किसी घोषणा के, बिना किसी विज्ञापन के--पक्षी जग जाते हैं। नींद में भी खबर हो जाती है कि सूरज निकल आया।
तुम्हारा गीत फूटेगा, बस उसी से खबर होगी। तुम्हारी गंध उड़ेगी, बस उसी से खबर होगी। और अतिरिक्त खबर देने की कोई जरूरत नहीं है। अहंकार की यात्राओं से सावधान रहो। अहंकार बड़ा कुशल, बड़ा चालबाज है, बड़ा चालाक है। हर तरह से अपने को बड़ा करने की चेष्टाएं खोजने लगता है। धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा हो--ठीक, चढ़ बैठता है, सवारी कर लेता है। इतना ही नहीं, ज्ञान हो, ध्यान हो, त्याग हो, संन्यास हो--वहां भी चढ़ बैठता है। वहां भी सवारी करने लगता है। रस को विषाक्त न करो। अहंकार विषाक्त कर देगा। चुप ही रहो।
चुप्पी भी कहती है। और चुप्पी खूब जोर से कहती है। कभी-कभी बड़े जोर से कहना भी इतने जोर से नहीं होता जितना मौन कह जाता है। मौन की क्षमता भी समझो।
तो पहली तो बात: कहने की कोई जरूरत नहीं है। तुम मेरे शिष्य हो, यह मुझसे कह दिया, काफी है। हालांकि मैं तुम्हारे भाव को समझ रहा हूं। तुम्हारा भाव बुरा भी नहीं है। लेकिन अहंकार बड़ा कुशल है, अच्छे भावों पर भी सवारी कर जाता है। इसलिए सावधान करना भी जरूरी है। अहंकार इतना कुशल है कि साधुता के पीछे भी छिप कर खड़ा हो जाता है; सरलता में से भी रास्ता निकाल लेता है; विनम्रता में भी दावेदार बन जाता है।
तुम्हारा भाव मैं समझा हूं। भाव तो सुंदर है। जब भी हमारे जीवन में कुछ आनंद घटता है, हम बांटना चाहते हैं। जिन्हें हम प्रेम करते हैं, उन्हें भी खबर पहुंचाना चाहते हैं। जिन्हें हमने चाहा है, जिन्हें हमने पहचाना है, चाहते हैं कि वे भी इस सन्मार्ग पर चलें, उन्हें भी यह प्रकाश मिले। तुम तृप्त होते हो किसी बात से, तो स्वभावतः तुम चाहते हो तुम्हारी पत्नी भी तृप्त हो, तुम्हारा पति भी तृप्त हो, तुम्हारे बच्चे भी तृप्त हों, तुम्हारे मित्र भी, तुम्हारे प्रियजन भी। तुम कहना चाहते हो।
तुम्हारा भाव बुरा नहीं है। लेकिन अहंकार अगर पीछे छिपा आया तो तुम चाहोगे कुछ, होगा उसके विपरीत। पति पत्नी को संन्यास में लाना चाहे तो मुश्किल पड़ जाती है, फिर पत्नी आती नहीं। जितना पति चेष्टा करता है, उतनी ही कठिनाई हो जाती है। पत्नी चाहती है कि पति आए, मुझे सुने, समझे, ध्यान करे--बस मुश्किल हो जाती है। बहुत मुश्किल हो जाती है। क्योंकि जिनसे तुम्हारे संबंध हैं, नाते हैं, वे कोई भी यह मानने को तैयार नहीं होते कि तुम उनसे ज्यादा बुद्धिमान हो। उनके अहंकार को चोट लगती है। वे कोई भी यह मानने को राजी नहीं होते। कोई पत्नी मान सकती है, कि मेरा पति और बुद्धिमान! ऐसा कभी हुआ है? कोई पति मान सकता है कि मेरी पत्नी और कभी कोई ऐसा काम करेगी जिसमें बुद्धि का लक्षण हो!
जिनसे हमारे नाते-रिश्ते हैं, उन सबको हम सोचते हैं कि उनमें कुछ समझ नहीं है। ऐसा ही वे भी तुम्हारे संबंध में सोचते हैं। इसलिए तो इतनी कलह होती है, इतने उपद्रव होते रहते हैं। संबंधों में सिवाय कलह के और कुछ होता दिखाई नहीं पड़ता। हर छोटी-छोटी बात पर कलह हो जाती है। छोटी-छोटी बात पर विवाद हो जाता है। व्यर्थ की बातों में से बातें निकल आती हैं।
तो तुम इस भ्रांति में मत रहना कि अपनी पत्नी को कहोगे कि मुझे बड़ा आनंद मिल रहा है, तो वह मानेगी। वह दुनिया में किसी के भी चरण छू सकती है। कोई भी ऐरा-गैरा-नत्थू उसके गांव में आ जाए, तो वह महाराज के चरण छू सकती है, कि बड़े ज्ञानी का आगमन हुआ है। मगर पति! यह तो आखिरी मामला है। अगर पत्नी पति को बुद्धिमान मान ले तो समझो क्रांति हुई। यह बिलकुल मुश्किल है। यह बहुत कठिन है।
जिनके साथ तुम बचपन से बड़े हुए हो वे तुम्हें ज्ञानी नहीं मान सकते। तुम्हारी तो बात ही छोड़ दो, उन्होंने बड़े-बड़े ज्ञानियों को ज्ञानी नहीं माना। जीसस अपने ही गांव में नहीं पूजे गए। जीसस की प्रसिद्ध उक्ति है कि पैगंबर को उसके ही गांव में नहीं पहचाना जाता। गांव के लोगों ने जीसस को बड़े होते देखा, उसी गांव में बड़े होते देखा, उसी गांव के रास्ते पर खेलते देखा। गांव के लोग जीसस को जानते थे, जीसस के बाप को जानते, बाप के बाप को जानते--सबको जानते थे। अचानक यह बेटा ईश्वरीय हो गया! यह असंभव है। यह बात भरोसे की नहीं होती। यह कैसे हो सकता है कि हम सब नहीं हो पाए ईश्वर और यह बेटा ईश्वर हो गया है! और यहीं लकड़ी ढोता था। क्योंकि बढ़ई का बेटा था। यहीं लकड़ी काटता था। इसके हाथ की बनाई हुई टेबल-कुर्सियां लोगों के घरों में हैं। और यह ईश्वर को पा गया! या तो पागल है, विक्षिप्त हो गया है; या धोखेबाज है, झूठे दावे कर रहा है। कौन मानेगा इसे!
बहुत कठिन हो जाता है। अहंकार को भारी चोट लगती है। इसलिए तो मुर्दा गुरुओं की दुनिया में प्रतिष्ठा रहती है। जिंदा गुरु की प्रतिष्ठा नहीं होती। जिंदा गुरु को पत्थर पड़ते हैं, गालियां पड़ती हैं। मुर्दा गुरु पर फूल बरसते हैं। क्यों, मुर्दा गुरु के साथ तुम्हारा इतना प्रेम कैसे हो जाता है एकदम से? मुर्दा गुरु से तुम्हारे अहंकार की कोई टक्कर नहीं होती। अब बुद्ध से तुम्हारी क्या टक्कर है? रहे होंगे बुद्धिमान तो रहे होंगे। कौन झंझट करे! रहे ही होंगे। दो फूल चढ़ाओ और छुटकारा पाओ। जीसस रहे होंगे बुद्धिमान, कृष्ण रहे होंगे ईश्वर के अवतार। लेकिन तुम्हारे सामने कोई बैठा हो, तुम्हारे घर में कोई बैठा हो, तुम्हारा समसामयिक हो, तुम्हारा संबंधी हो, तुम्हारा बेटा हो, तुम्हारी बेटी हो, तुम्हारा पति हो, पत्नि हो, तुम्हारा पिता हो, तुम्हारा मित्र हो--बहुत कठिन हो जाती है बात, असंभव हो जाती है बात। बड़ी बोध की क्षमता चाहिए तो कोई सुनेगा, समझेगा।
तुम कहना चाहते हो, ठीक; लेकिन सुनेगा कौन, मानेगा कौन! और फिर एक तीसरी कठिनाई, कुछ बातें हैं जो कही जा सकती नहीं। उन बातों में एक बात यह भी है--प्रेम अनिर्वाच्य है। और शिष्य और गुरु के बीच जो प्रेम घटता है वह सर्वाधिक अनिर्वाच्य है, क्योंकि वह प्रेम की पराकाष्ठा है।
तीन तरह के प्रेम होते हैं। क्योंकि मनुष्य के भीतर जीवन के तीन तल हैं। एक तो शरीर का प्रेम होता है। उसे भी बताना कठिन होता है, लेकिन फिर भी इतना कठिन नहीं होता, क्योंकि स्थूल है; स्थूल स्थूल का नाता है। फिर दूसरा प्रेम मन का प्रेम होता है। उसे बताना और कठिन हो जाता है। क्योंकि मन को देखा किसने है! देखा नहीं, कल सुंदरदास कहते थे--न उसका माथा है, न उसका सिर है, न उसका शरीर है! अशरीरी है। इस मन के प्रेम को कैसे प्रकट करो! और कोई अगर इनकार करे तो सिद्ध न कर पाओगे। शरीर का प्रेम दिखलाने के तो उपाय हैं। किसी को छाती से लगा लो, तो शरीर का प्रेम पता चलता है।
मन के प्रेम को क्या करोगे? कैसे प्रकटाओगे? हां, जिससे प्रेम है उसे शायद समझ में आ जाए। वह शायद तुम्हारी भाव-भंगिमा में पहचान ले, तुम्हारी मुद्रा में पहचान ले। तुम्हारे शब्दों में छिपा हुआ रस, तुम्हारे उठने-बैठने में, तुम्हारी आतुरता में, तुम्हारी आंखों में--उसे थोड़ी झलक मिल जाए शायद--वह भी शायद! क्योंकि जिनसे हमारा प्रेम है उनसे भी हमें कहना पड़ता है; कहना पड़ता है, तो शायद उनकी समझ में आता है। अगर तुम न कहो तो उनकी समझ में नहीं आता। कहने का मतलब है कि मन को शरीर तक लाना पड़ता है। जो कही गई है बात, वह तो शरीर की हो जाती है। शब्द तो शरीर से पैदा होते हैं। मन की बात तो मन में रहती है। मन की बात तो मौन में होती है। लेकिन कभी-कभी प्रेमी इस ऊंचाई पर आ जाते हैं कि शब्दों की जरूरत नहीं होती। साथ बैठे होते हैं--चुप। नहीं कुछ कहा जाता। नहीं कुछ बोला जाता। नहीं कुछ लिया-दिया जाता। मगर एक संवाद चलता है। ऊर्जा से ऊर्जा कहती है। शक्ति की तरंगें एक-दूसरे तक पहुंचती हैं। एक उल्लास होता है। सिर्फ मौजूदगी काफी होती है।
लेकिन अगर दूसरे को समझाने जाओगे तो मुश्किल हो जाएगी। लेकिन शायद कोई काव्य में कह दे, कोई बांसुरी में बजा दे, कोई वीणा पर तारों में झंकृत कर दे। इसी से काव्य पैदा हुआ, संगीत पैदा हुआ, नृत्य पैदा हुआ। यह जो मन का प्रेम है उसको प्रकट करने के उपाय खोजे गए।
लेकिन फिर एक तीसरा प्रेम है--आत्मा से आत्मा का। वही शिष्य और गुरु का प्रेम है। उसको कहने के लिए न तो संगीत समर्थ है, न काव्य समर्थ है। उसे कहने का कोई उपाय ही नहीं है। वह तो इतना गूढ़ है कि सब अभिव्यक्तियों के पार है। उसे तो गुरु समझता है, शिष्य समझता है। वह तो बिलकुल चुप-चुप है। कोई निवेदन भी करने का कारण नहीं होता वहां। उसे तुम दूसरों को समझाना चाहोगे, तो बहुत मुश्किल में पड़ोगे। न समझा पाओगे। वह तो एक अंतःसलिला है, एक भीतर की गंगा है।
कुछ भौतिक कुछ मानसिक से तुम
कुछ किरन कुछ कुंकुम
बैठे हो हिले बिना मन में मेरे
जैसे गुलाब कोई खिले बिना
घेरे हो वातावरण अपनी सुगंध से
जैसे विचार कोई गीत बने बिना
रच जाए भीतर प्राणों में हिना
अव्यक्त!.
कुछ भौतिक कुछ मानसिक से तुम
कुछ किरन कुछ कुंकुम
बैठे हो हिले बिना मन में मेरे
जैसे गुलाब कोई खिले बिना
घेरे हो वातावरण अपनी सुगंध से
जैसे विचार कोई गीत बने बिना
रच जाए भीतर प्राणों में हिना।
सब चुपचाप हो जाता है। न फूल खिलता है, और गंध बिखर जाती है। न गीत जगता है, लेकिन काव्य फैल जाता है। न वीणा बजती है, न वीणा के तार छेड़े जाते हैं--और संगीत का सागर लहराता है।
कुछ किरन कुछ धूप
कुछ पकड़ में आने लायक रूप
कुछ जड़ कुछ जंगम
यह सरस्वती संगम किसको समझाऊं
जो बह रहा है भीतर-भीतर
ओंठों पर कैसे लाऊं आकृति वह झुटपुटे में पड़ी हुई
जागृति में जड़ जिसकी
सपने में बड़ी हुई
चकित क्यों करूं अब उसे
खींच कर चकाचौंध में
क्यों पंखुरी दूं सौरभ ही सौरभ को
अतिचेतन को क्यों प्राण दूं
अंतःसलिला तुम्हारी स्मृति को
क्यों गंगा-जमुनी परिधान दूं!
नहीं, शब्द नहीं काम आएंगे। यह तो निःशब्द की लीला है। यह तो मौन का संगम है। यह तो बड़ी झुटपुटे में हुई बात है। न दिन, न रात--सांझ की घड़ी में घटी बात है।
कुछ किरन कुछ धूप
कुछ पकड़ में आने लायक रूप
कुछ जड़ कुछ जंगम
यह सरस्वती संगम किसको समझाऊं
तुमने देखा! हमारी प्रतीक-कथा है कि प्रयाग के महातीर्थ पर तीन नदियां आकर मिलती हैं। गंगा है, यमुना है और सरस्वती है। दो तो दिखाई पड़ती हैं, तीसरी दिखाई पड़ती नहीं। वह तीसरी ही प्रेम की अंतिम ऊंचाई है। वही सरस्वती है।
कुछ जड़ कुछ जंगम
यह सरस्वती संगम किसको समझाऊं
तो गंगा भी बताई जा सकती है, यमुना भी बताई जा सकती है, मगर सरस्वती को बताने चलोगे तो मुश्किल में पड़ोगे। कोई बता नहीं सका। उसे अदृश्य ही रखा है। दुनिया में बहुत संगम हैं, लेकिन जैसा महातीर्थ हमने बनाया है--एक अदृश्य नदी के साथ जोड़ कर, वैसा किसी ने कहीं बनाया नहीं है। दो दृश्य हैं, एक अदृश्य है। और जो अदृश्य है वही सारे दृश्यों का आधार है। सब दृश्य उसी से जन्मते और सब दृश्य उसी में एक दिन लीन हो जाते हैं।
जो बह रहा है भीतर-भीतर
ओंठों पर कैसे लाऊं.
लाया जा सकता नहीं। लाओगे तो बहुत पछताओगे। क्योंकि जो आएगा वह कुछ का कुछ होगा। जो कहने चले थे, न कहा जाएगा। कुछ और निकल आएगा।
लाओत्सु का प्रसिद्ध वचन है--सत्य कहा जा सके तो सत्य नहीं। जो सत्य बोला जा सके, असत्य हो जाता है--बोलते ही असत्य हो जाता है। तब तो सारे शास्त्र असत्य हो गए। और लाओत्सु ठीक ही कहता है। सारे शास्त्र चेष्टाएं हैं उसको कहने की, जो नहीं कहा जा सकता। और सब हार गए हैं, और हारते ही रहेंगे।
और यह हमारा सौभाग्य है कि शास्त्र जीते नहीं। अगर शास्त्र जीत जाते, शब्द कूड़ा-कचरे जैसे हैं, सत्य भी कूड़ा-कचरा हो जाता। अच्छा है कि शास्त्र हारते रहे और शास्त्र हारते रहेंगे। अच्छा है कि न कभी सत्य कहा गया और न कभी कहा जाएगा। खोजना पड़ता है। स्वयं ही जानना पड़ता है। अंतःप्रज्ञा होती है उसकी। एक-एक को अपना-अपना सत्य खोजना होता है। एक-एक को अपना-अपना सत्य जानना होता है। उधार सत्य काम नहीं आते। दूसरे के कहे सत्य काम नहीं आते।
ओंठों पर कैसे लाऊं आकृति वह झुटपुटे में पड़ी हुई
जागृति में जड़ जिसकी
सपने में बड़ी हुई
जो फैली है सारे जीवन में--जागृति से लेकर स्वप्न तक, स्वप्न से लेकर जाग्रत तक। जब प्रेम तुम्हें सघनता से पकड़ता है तो तुम्हारे जीवन के सब तलों पर फैल जाता है। तुम जाग्रत में भी प्रेमी को याद रखते हो। हजार कामों में लगे रहते हो और प्रेम की धुन बनी रहती है। हजार काम में उलझे रहते हो, मगर भूल नहीं होती। एक अंतःसलिला बहती रहती है। रात सपने में भी प्रेमी की छाया पड़ती है। और जो जानते हैं और जो जागे हैं, उन्होंने पाया है कि गहरी से गहरी निद्रा में भी जब स्वप्न भी शांत हो जाते हैं, तब भी प्रेम की अंतःसलिला बनी रहती है।
प्रेम जगता है तो तुम्हारे चौबीसों घंटों को घेर लेता है। तुम्हारी हर घड़ी फूल जैसी टंक जाती है माला में। और तुम्हारे सब फूलों के भीतर प्रेम का धागा अनस्यूत होता है।
चकित क्यों करूं अब उसे
खींच कर चकाचौंध में
क्यों फिकर करते हो? जो हुआ है, उसे सम्हालो। उसे चकाचौंध में खींच कर लाभ भी क्या होगा? उसे किसी से कहने जाओगे, कह भी न पाओगे। उलझन में भी पड़ोगे, संकोच भी खाओगे, हाराहारापन भी मालूम होगा। फिर ठीक न कह पाओगे तो अपराध भी जगेगा, कि कुछ कहने गए, कुछ कह गए। विवाद में जीत भी न सकोगे, सिद्ध भी न कर पाओगे, क्योंकि ये बातें सिद्ध करने की नहीं।
चकित क्यों करूं अब उसे
खींच कर चकाचौंध में
क्यों पंखुरी दूं सौरभ ही सौरभ को
जो सुगंध ही सुगंध है, जो सौरभ ही सौरभ है, उसे क्यों खींच कर पंखुरी बनाओ? जो इत्र ही इत्र है, अब उसे क्यों फिर वापस फूल बनाओ? उसे क्यों शब्द में लाओ? उसे क्यों प्रकट करो? उसे अप्रकट ही रहने दो। और मैं तुमसे कहता हूं: जितना तुम उसे अप्रकट रहने दोगे, उतना ही गहन होगा, उतना ही सघन होगा, उतना ही प्रगाढ़ होगा। और एक ऐसी घड़ी आती है कि उसकी प्रगाढ़ता ही औरों को चकित करेगी। उसकी प्रगाढ़ता ही दूसरों के तार झनझना जाएगी। लोग तुमसे पूछने लगेंगे: ‘क्या हुआ तुम्हें? कैसे हुआ तुम्हें?’ तुम्हारी मौजूदगी एक ठंडक लाएगी। तुम किसी के पास बैठोगे तो उस आदमी के भीतर की तरंगें बदल जाएंगी। मगर इतना इकट्ठा होने दो। इतना इकट्ठा होने दो कि जो भी तुम्हारे पास आए वह आंदोलित हो उठे, संक्रमित हो जाए। ये बातें कहने की नहीं हैं--संक्रमित होने की हैं।
चकित क्यों करूं अब उसे
खींच कर चकाचौंध में
क्यों पंखुरी दूं सौरभ ही सौरभ को
अतिचेतन को क्यों प्राण दूं
अंतःसलिला तुम्हारी स्मृति को
क्यों गंगा-जमुनी परिधान दूं!
सरस्वती को सरस्वती ही रहने दो। उसे न गंगा बनाओ न जमुना बनाओ। उसे वस्त्र न पहनाओ शब्दों के। उसे निर्वस्त्र, शून्य रहने दो। उसमें बल होगा, तो जो जान सकते हैं, जिनमें जानने की पात्रता है, वे जान लेंगे। और उसमें बड़ा बल है।
तुमने देखा? किसी ने कभी सोचा था कि पदार्थ के सबसे छोटे हिस्से अणु में, जो आंखों से दिखाई नहीं पड़ता, जो इतना छोटा है कि जिसे अभी यंत्रों से भी देखा नहीं गया है, जिसे किसी ने नहीं देखा है, जिसके छोटेपन का अंदाज तुम ऐसा लगा सकते हो कि अगर एक अणु के ऊपर दूसरा अणु, दूसरे के ऊपर तीसरा, ऐसे एक लाख अणु एक के ऊपर एक रखे जाएं तो आदमी के बाल के बराबर उनकी मोटाई हो--उस एक छोटे से अणु में कितनी शक्ति का आविर्भाव हुआ है! उसका विस्फोट. तो उसकी कथा नागासाकी और हिरोशिमा में लिखी है। उसका विस्फोट--और एक लाख आदमी क्षण में राख हो गए। अगर पदार्थ के एक अणु की इतनी क्षमता है तो चैतन्य के एक अणु की कितनी क्षमता न होगी! अगर पदार्थ के एक अणु का विस्फोट होता है, लाखों लोग मर जाते हैं--तो क्या तुम सोचते हो जब एक बुद्ध का विस्फोट होता होगा तो करोड़ों लोग जीवित न हो जाते होंगे! जिन्होंने जीवन कभी न जाना था, जिनकी शाखाओं पर कभी पत्ते न खिले थे, कभी फूल न लगे थे, उनकी शाखाओं पर पत्ते-फूल न लग जाते होंगे! जिन रेगिस्तानों में कभी धारा न बही थी जल की--क्या उनमें जलधाराएं न बह उठती होंगी?
बुद्धत्व चैतन्य का विस्फोट है। चैतन्य का विस्फोट कहो या प्रेम का विस्फोट, एक ही बात को कहने के दो ढंग हैं। एक ज्ञानी का ढंग है, एक प्रेमी का ढंग है। एक भक्त का, एक ध्यानी का।
तुम कहते हो: ‘मैं आपका शिष्य हूं, आप हैं मेरे गुरु--इसे सारे जगत से कहना चाहता हूं, पर कह नहीं पाता।’
चुप रहो! यह अपने से कहा जाएगा। तुम साधो इसे। तुम इसे गहराते जाओ। तुम सींचो इसकी जड़ों को। तुम अपने पूरे प्राण से इसे सींचो। तुम फिकर ही छोड़ दो शेष सब। जिस दिन होना है, अभिव्यक्ति उस दिन होगी।
कौन है जो मौन है मन में मेरे
और मुस्कुराता है
आंख करना चाहता हूं चार
वह आगे न आता है
हर सुबह में जब उघड़ती आंख
लगता है कि बैठा था सिरहाने
हर निशा में जब झपकती आंख
लगता है कि आया है सुलाने
हर उदय में शक्ति देता
यामिनी में गीत गाता है
किसी क्षण में, अभी यह लगता है
कि जैसे बरजता है, यह न कर
किसी क्षण में धीर देता जान पड़ता है
कि इसको कर, न डर
किसी क्षण में हर द्विधा से हीन करता
प्राण को ऊपर उठाता है
कौन है, जो मौन है मन में मेरे
और मुस्कुराता है!
शिष्य होने का अर्थ है: गुरु को अपने हृदय में बिठा लेना। शिष्य होने का अर्थ है, अब अपने से नहीं जीएंगे, अब उसकी आवाज से जीएंगे। अब उसकी प्रेरणा ही हमारे जीवन की व्यवस्था, हमारे जीवन का अनुशासन होगी। और तब निश्चित ही तुम्हारे अंतःकरण से उसकी आवाज आने लगती है।
ऐसे मैं तुमसे बाहर से बोल रहा हूं, लेकिन जिन्होंने मुझे भीतर लिया है, उनसे मैंने भीतर से बोलना शुरू कर दिया है।
कौन है जो मौन है मन में मेरे
और मुस्कुराता है!
कभी जब मैं तुम्हारे भीतर मुस्कुराऊं तो घबड़ाना मत! क्योंकि तब तुम्हें मुस्कुराहट पागल जैसी मालूम पड़ेगी, क्योंकि तुम तो नहीं मुस्कुरा रहे हो। और कभी जब मैं तुम्हारे भीतर रोऊं, तो चिंतित मत हो जाना, व्यथित मत हो जाना। क्योंकि आंसू तो गिरेंगे और तुम्हें कारण कुछ भी न दिखाई पड़ेगा। कारण तो धीरे-धीरे समझ में आएगा। धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे! एक दिन तुम पहचानोगे--कौन हंसा था, कौन रोया था?
आंख करना चाहता हूं चार
वह आगे न आता है
हर सुबह में जब उघड़ती आंख
लगता है कि बैठा था सिरहाने
शिष्य और गुरु का नाता कुछ ऐसा-वैसा नाता नहीं है कि बने और मिट जाए। बनता है तो मिटता ही नहीं। और मिट जाए, तो समझना कि बना ही नहीं था। तुम भ्रांति में पड़े होओगे। तुमने मान लिया होगा।
हर सुबह में जब उघड़ती आंख
लगता है कि बैठा था सिरहाने
हर निशा में जब झपकती आंख
लगता है कि आया है सुलाने
हर उदय में शक्ति देता
यामिनी में गीत गाता है
किसी क्षण में अभी यह लगता है
कि जैसे बरजता है, यह न कर
किसी क्षण में धीर देता जान पड़ता है
कि इसको कर, न डर
किसी क्षण में हर द्विधा से हीन करता
प्राण को ऊपर उठाता है
कौन है जो मौन है मन में मेरे
और मुस्कुराता है!
इसे धीरे-धीरे भीतर-भीतर साधे जाओ। इसे धीरे-धीरे भीतर-भीतर बांधे जाओ। बड़ा बांध बनाओ। जल्दी न करो इसे कह देने की। यह अपनी ही ऊर्जा से किसी दिन प्रकट होगा। तुम इसे प्रकट न कर पाओगे। जब प्रकट होगा, अपनी ही ऊर्जा से प्रकट होगा, फिर तुम रोकना चाहो तो रोक न पाओगे। तुम्हारे किए प्रकट भी नहीं होगा, तुम्हारे किए रोका भी न जा सकेगा।
और तब एक सौंदर्य है, तब एक अनूठा सौंदर्य है! जब तुम नहीं करते और अपने से होता है! जब गीत अपने से फूटता है, नाच अपने से उठता है! तुम सिर्फ दर्शक होते हो, या कि दर्शक भी नहीं होते! तुम साक्षीमात्र होते हो, या कि साक्षी भी नहीं होते! सब मिट गया होता है, तुम होते ही नहीं।
जिस दिन शिष्य बिलकुल नहीं बचता, उस दिन जो बात फूटनी शुरू होती है वही जगत को खबर ले जा सकती है।
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