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“RSS is the evaluation of the life mission of the Hindu nation.”
“आरएसएस, हिन्दू राष्ट्र के जीवन मिशन का मूल्यांकन और उसके क्रियान्वयन का संगठन है।”


�� ,राष्टीय स्वयंसेवक संघ �����

19/08/2026

#ᴠɪʀᴀʟ

15/08/2026

Happy Independence Day 😇
#ᴠɪʀᴀʟ

14/08/2026

क्यों लेना पड़ा भगवान विष्णु को वामन रूप में जन्म

उस समय दैत्यों का राजा बलि हुआ करता था। बलि बड़ा पराक्रमी राजा था। उसने तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। उसकी शक्ति के घबराकर सभी देवता भगवान वामन के पास पहुंचे तब भगवान विष्णु ने अदिति और कश्यप के यहाँ जन्म लिया। एक समय वामन रूप मे

दैत्यों का राजा बलि बड़ा पराक्रमी राजा था। उसने तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। उसकी शक्ति के घबराकर सभी देवता भगवान वामन के पास पहुंचे तब भगवान विष्णु ने अदिति और कश्यप के यहाँ जन्म लिया। एक समय वामन रूप में विराजमान भगवान विष्णु राजा बलि के यहाँ पहुचे उस समय राजा बलि यज्ञ कर रहा थे। बलि से उन्होंने कहा राजा मुझे दान दीजिए। बलि ने कहा-मांग लीजिए। वामन ने कहा तीन पग मुझे आपसे धरती चाहिए। दैत्यगुरु भगवान की महिमा जान गए। उन्होंने बलि को दान का संकल्प लेने से मना कर दिया। लेकिन बलि ने कहा - गुरुजी ये क्या बात कर रहे हैं आप। यदि ये भगवान हैं तो भी मैं इन्हें खाली हाथ नहीं जाने दे सकता। बलि ने संकल्प ले लिया। भगवान वामन ने अपने विराट स्वरूप से एक पग में बलि का राज्य नाप लिया, एक पैर से स्वर्ग का राज नाप लिया। बलि के पास कुछ भी नहीं बचा। तब भगवान ने कहा तीसरा पग कहां रखूं। बलि ने कहा- -मेरे मस्तक पर रख दीजिए। जैसे ही भगवान ने उसके ऊपर पग धरा राजा बलि पाताल में चले गए। भगवान ने बलि को पाताल का राजा बना दिया।

सतयुग में दैत्यराज प्रह्लाद के पोत्र बलि ने स्वर्ग में अधिकार कर लिया था। सभी देवता इस विपत्ति से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने देवताओ से कहा की में स्वयं देवमाता अदिति के गर्भ से जन्म लेकर तुम्हे स्वर्ग का राज्य दिलाऊंगा। कुछ समय पश्चात भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को भगवान विष्णु ने वामन अवतार के रूप में जन्म लिया। इधर दैत्यराज बलि ने अपने गुरु शुक्रचार्य और मुनियो के साथ दीर्घकाल तक चलने वाले यज्ञ का आयोजन किया।

बलि के इस महायज्ञ में ब्रह्मचारी वामन जी भी गए। वे अपनी मुस्कान से सब लोगो के मन मोह लेते थे। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने अपने तपो बल से वामन के रूप में अवतरित भगवान विष्णु को पहचान लिया। उन्होंने बलि को बताया की तुम्हारी राजलक्ष्मी का अपरहण करने भगवान विष्णु वामनरूपी अवतार में आये है। गुरुदेव की बातो को सुन कर राजा बलि ने कहा – हे गुरुदेव आप क्यों धर्म विरोधी वचन कह रहे है, भगवान विष्णु स्वयं मुझ से दान मांगने आये है इस से बढ़कर और क्या हो सकता है। मैं तो केवल भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए यह यज्ञ कर रहा हुँ। यदि भगवान विष्णु स्वयं पधारे है तो में कृतार्थ हो गया।

तभी वामनजी बलि के यज्ञशाला में पधारे, उन्हें देख राजा बलि अपने दोनों हाथ जोड़ के उनके सामने खड़े हो गए और कहा, हे प्रभु मुझे अपनी सेवा का अवसर दीजिये।तब वामन भगवान ने उनसे तीन पग भूमि मांगी और कहा भूमिदान का महात्म्य महान है। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य भगवान विष्णु की लीला समझ गए और उन्होंने राजा बलि को दान देने से मना किया। लेकिन फिर भी बलि ने भूमि दान के संकल्प के लिए कलश उठाया परन्तु गुरु शुक्राचार्य उस कलश में घुस गए। भगवान विष्णु यह जान गए की गुरु शुक्राचार्य कलश में घुसकर जल की धारा को रोक रहे है .अतः उन्होंने कुश के अग्र भाग को कलश के मुख में घुसेड़ दिया जिसने गुरु शुक्राचार्य की एक आँख को नष्ट कर दिया। पीड़ा से व्याकुल होकर गुरु शुक्राचार्य उस कलश से बाहर निकले।

तब बलिं ने तीन पग दान का संकल्प लिया। भगवान विष्णु ने विशाल रूप धारण कर पहले एक पग पूरी धरती को नाप लिया तथा अपने दूसरे पग में उन्होंने पुरे स्वर्गलोक को नापा। जब तीसरे पग के रखने के लिए कोई जगह नही बची तो बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया। वामन भगवान ने उन्हें भय दिखाया की यदि तुमने अपना संकल्प पूरा नही किया तो ये अधर्म होगा। तब तीसरे पग के लिए अपने आप को समर्पित करते हुए राजा बलि ने अपना सर उनके पग के निचे रख लिया। वामन भगवान के तीसरा पग रखते ही बलि पाताललोक पहुंच गया। बलि की दानवीरता को देख वामनरूप भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल का राजा बना दिया और इस तरह भगवान विष्णु ने इंद्र को स्वर्गलोक सोपा उस समय दैत्यों का राजा बलि हुआ करता था। बलि बड़ा पराक्रमी राजा था। उसने तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। उसकी शक्ति के घबराकर सभी देवता भगवान वामन के पास पहुंचे तब भगवान विष्णु ने अदिति और कश्यप के यहाँ जन्म लिया। एक समय वामन रूप मे

दैत्यों का राजा बलि बड़ा पराक्रमी राजा था। उसने तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। उसकी शक्ति के घबराकर सभी देवता भगवान वामन के पास पहुंचे तब भगवान विष्णु ने अदिति और कश्यप के यहाँ जन्म लिया। एक समय वामन रूप में विराजमान भगवान विष्णु राजा बलि के यहाँ पहुचे उस समय राजा बलि यज्ञ कर रहा थे। बलि से उन्होंने कहा राजा मुझे दान दीजिए। बलि ने कहा-मांग लीजिए। वामन ने कहा तीन पग मुझे आपसे धरती चाहिए। दैत्यगुरु भगवान की महिमा जान गए। उन्होंने बलि को दान का संकल्प लेने से मना कर दिया। लेकिन बलि ने कहा - गुरुजी ये क्या बात कर रहे हैं आप। यदि ये भगवान हैं तो भी मैं इन्हें खाली हाथ नहीं जाने दे सकता। बलि ने संकल्प ले लिया। भगवान वामन ने अपने विराट स्वरूप से एक पग में बलि का राज्य नाप लिया, एक पैर से स्वर्ग का राज नाप लिया। बलि के पास कुछ भी नहीं बचा। तब भगवान ने कहा तीसरा पग कहां रखूं। बलि ने कहा- -मेरे मस्तक पर रख दीजिए। जैसे ही भगवान ने उसके ऊपर पग धरा राजा बलि पाताल में चले गए। भगवान ने बलि को पाताल का राजा बना दिया।

सतयुग में दैत्यराज प्रह्लाद के पोत्र बलि ने स्वर्ग में अधिकार कर लिया था। सभी देवता इस विपत्ति से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने देवताओ से कहा की में स्वयं देवमाता अदिति के गर्भ से जन्म लेकर तुम्हे स्वर्ग का राज्य दिलाऊंगा। कुछ समय पश्चात भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को भगवान विष्णु ने वामन अवतार के रूप में जन्म लिया। इधर दैत्यराज बलि ने अपने गुरु शुक्रचार्य और मुनियो के साथ दीर्घकाल तक चलने वाले यज्ञ का आयोजन किया।

बलि के इस महायज्ञ में ब्रह्मचारी वामन जी भी गए। वे अपनी मुस्कान से सब लोगो के मन मोह लेते थे। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने अपने तपो बल से वामन के रूप में अवतरित भगवान विष्णु को पहचान लिया। उन्होंने बलि को बताया की तुम्हारी राजलक्ष्मी का अपरहण करने भगवान विष्णु वामनरूपी अवतार में आये है। गुरुदेव की बातो को सुन कर राजा बलि ने कहा – हे गुरुदेव आप क्यों धर्म विरोधी वचन कह रहे है, भगवान विष्णु स्वयं मुझ से दान मांगने आये है इस से बढ़कर और क्या हो सकता है। मैं तो केवल भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए यह यज्ञ कर रहा हुँ। यदि भगवान विष्णु स्वयं पधारे है तो में कृतार्थ हो गया।

तभी वामनजी बलि के यज्ञशाला में पधारे, उन्हें देख राजा बलि अपने दोनों हाथ जोड़ के उनके सामने खड़े हो गए और कहा, हे प्रभु मुझे अपनी सेवा का अवसर दीजिये।तब वामन भगवान ने उनसे तीन पग भूमि मांगी और कहा भूमिदान का महात्म्य महान है। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य भगवान विष्णु की लीला समझ गए और उन्होंने राजा बलि को दान देने से मना किया। लेकिन फिर भी बलि ने भूमि दान के संकल्प के लिए कलश उठाया परन्तु गुरु शुक्राचार्य उस कलश में घुस गए। भगवान विष्णु यह जान गए की गुरु शुक्राचार्य कलश में घुसकर जल की धारा को रोक रहे है .अतः उन्होंने कुश के अग्र भाग को कलश के मुख में घुसेड़ दिया जिसने गुरु शुक्राचार्य की एक आँख को नष्ट कर दिया। पीड़ा से व्याकुल होकर गुरु शुक्राचार्य उस कलश से बाहर निकले।

तब बलिं ने तीन पग दान का संकल्प लिया। भगवान विष्णु ने विशाल रूप धारण कर पहले एक पग पूरी धरती को नाप लिया तथा अपने दूसरे पग में उन्होंने पुरे स्वर्गलोक को नापा। जब तीसरे पग के रखने के लिए कोई जगह नही बची तो बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया। वामन भगवान ने उन्हें भय दिखाया की यदि तुमने अपना संकल्प पूरा नही किया तो ये अधर्म होगा। तब तीसरे पग के लिए अपने आप को समर्पित करते हुए राजा बलि ने अपना सर उनके पग के निचे रख लिया। वामन भगवान के तीसरा पग रखते ही बलि पाताललोक पहुंच गया। बलि की दानवीरता को देख वामनरूप भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल का राजा बना दिया और इस तरह भगवान विष्णु ने इंद्र को स्वर्गलोक सोपा

Photos from Bikram.Singh 's post 13/08/2026

क्या आप शिव महापुराणम से विश्वेश्वर संहिता के भाग 5 की व्याख्या कर सकते हैं?
वैसे यह बौद्धिक व्याख्या का विषय ही नहीं है यह अनुभूति का सत्य है
प्रथम श्लोक 1–7 में अध्याय की शुरुआत एक व्यावहारिक प्रश्न से होती है। जो व्यक्ति श्रवण, कीर्तन और मनन की त्रयी में समर्थ नहीं है, वह शिवलिंग और शिव-बेर की स्थापना करके नित्य पूजा करे—ऐसा पाठ कहता है। आगे अपनी सामर्थ्य के अनुसार द्रव्य, मंडप, धूप, दीप, नैवेद्य, प्रदक्षिणा, नमस्कार और जप आदि का विधान आता है।

शास्त्र साधना की एक ही क्षमता को सब पर आरोपित नहीं करता।यदि अमूर्त चिंतन कठिन है, तो प्रतीक दिया गया।यदि दीर्घ ध्यान कठिन है, तो पूजा की संरचना दी गई। यदि विशाल अनुष्ठान संभव नहीं, तो "यथाशक्ति" का सिद्धान्त रखा गया।साधना का माध्यम साधक की वर्तमान क्षमता के साथ संगत होना चाहिए

और यहां यह भी समझना अति आवश्यक है जैसे धुआँ आग का संकेत हो सकता है, लेकिन धुआँ स्वयं आग नहीं है; वैसे ही प्रतीक साधक को उस तत्त्व की ओर निर्देशित करता है जिसकी ओर वह संकेत करता है।

है। बोध प्रतीक को अंतिम सत्य मानने की प्रवृत्ति से आगे ले जाता है और साधक को उस मूल तत्त्व की ओर लौटाता है जिसकी ओर प्रतीक संकेत कर रहा था। लेकिन यह लौटना समाप्ति नहीं है, क्योंकि साधक उसी संसार में वापस आता है और वही प्रतीक अब बदली हुई चेतना से पुनः देखा जाता है। इसलिए प्रतीक वही होते हुए भी उसका अर्थ बदल सकता है।

यहीं शिवलिंग केवल पूजित वस्तु नहीं रहता; वह एक दार्शनिक संकेत बन जाता है। और शिव-विग्रह केवल आकृति नहीं रहता; वह उसी तत्त्व को गुण, रूप और संबंध के माध्यम से ग्रहण करने का विज्ञान का आधार बन जाता है।।

श्लोक 24–31 में सनत्कुमार अब पूछते हैं:लिंग की उत्पत्ति कैसे हुई?

नन्दिकेश्वर उत्तर देते हैं कि एक प्राचीन कल्प में ब्रह्मा और विष्णु के बीच संघर्ष हुआ। उनके मान को दूर करने के लिए परमेश्वर उनके बीच निष्कल स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। फिर उसी स्तंभ से शिव के लिंग-चिह्न की स्थापना की कथा आती है।ब्रह्मा और विष्णु:देखते हैं।खोजते हैं।मापना चाहते हैं।

लेकिन जिस तत्त्व को वे खोज रहे हैं, वह स्वयं उनकी खोज की सीमा से बाहर निकल जाता है।

यह

यही आधुनिक विज्ञान में भी एक सामान्य ज्ञान मीमांसा समस्या है—मापन की क्षमता और वस्तु की सम्पूर्णता एक ही चीज नहीं हैं।

बहुत सरल भाव रूप में

शिवलिंग ,शिव के निष्कल/निराकार तत्त्व का प्रतीक है

शिव-बेर/ मूर्ति शिव के सकल/साकार तत्त्व का विग्रह है

और संहिता की विशेष बात यह है कि शिव को केवल इनमें से एक नहीं माना गया; वह सकल भी और निष्कल भी हैं। इसलिए शिव की उपासना लिंग और साकार विग्रह दोनों में की जाती है।अर्थात यदि आपके सामने:

जटाधारी शिव की मूर्ति, त्रिनेत्र शिव,ध्यानमग्न शिव,नटराज,अर्धनारीश्वर, जैसा मानवीय/आइकोनोग्राफिक रूप है, तो वह इस संदर्भ में शिव-बेर/साकार विग्रह की श्रेणी में समझा जा सकता है।

और शिव लिंग साधक को कहता है कि “रूप के पार उस तत्त्व को खोजो जो किसी एक आकृति में सीमित नहीं है।”जबकि मूर्ति कहती है “उसी तत्त्व को रूप, कथा, गुण, संबंध और भाव के माध्यम से अपने सामने अनुभव करो।” नहीं तो अंनत के अरुप अंधकार में खो जाओगे इसलिए शिव भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का ध्यान करते हैं

यदि शिव केवल निष्कल होते, तो उपासक को केवल निराकार तत्त्व पर ध्यान करना पड़ता।यदि शिव केवल सकल होते, तो उन्हें एक निश्चित रूप में सीमित किया जा सकता।अर्थात एक ही परम तत्त्व में दोनों आयामों को स्वीकार किया गया। यहाँ "लिंग" शब्द को केवल आधुनिक शाब्दिक अर्थ से पढ़ना गंभीर त्रुटि है इस संदर्भ में लिङ्ग का दार्शनिक अर्थ चिह्न/संकेत भी है।ब्रह्मा और विष्णु सीमित खोजकर्ता बन जाते हैं।शिव का स्तंभ अनंत हो जाता है।अर्थात "ऊपर" और "नीचे" की खोज क्यों असफल होती एक खोज ऊपर जाती है,मात्र प्रकाश की ओर।दूसरी नीचे, मात्र अंधकार की ओर।लेकिन दोनों को सीमा नहीं मिलती।कथा केवल यह नहीं कह रही कि ब्रह्मा और विष्णु गणितीय सीमा हल कर रहे थे। वह यहभी दिखा रही है कि जिस सत्ता की सीमा ही अनंत हैउसे सीमित दिशा में चलकर पूर्णतः समाप्त नहीं किया जा सकता है

सकल और निष्कल दो अलग शिव नहीं हैं। वे शिव के दो परस्पर संबंधित आयाम हैं यही कारण है कि पंचम अध्याय के अंतिम श्लोक में “शिवस्य लिंगबेरत्वं भोगमोक्षप्रदं शुभम्” कहा गया है—अर्थात शिव के लिंग और बेर दोनों को भोग तथा मोक्ष से संबंधित उपासना-रूप बताया गया है। कि अन्य देवताओं की प्रतिमाएँ उनके-अपने भोग प्रदान करती हैं, जबकि शिव के लिंग और बेर दोनों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाला कहा गया है।

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