Riya Pandit

Riya Pandit

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12/08/2026

सीख देने वाली प्रेरणादायक कहानी✍️
पत्नी और पति में झगड़ा हो गया। पति और बच्चे खाना खाकर सो गए तो पत्नी घर से बाहर निकाल गई, यह सोचकर कि अब वह अपने पति के साथ नहीं रह सकती। मोहल्ले की गलियों में इधर-उधर भटक रही थी कि तभी उसे एक घर से आवाज सुनाई दी, जहाँ एक स्त्री रोटी के लिए ईश्वर से अपने बच्चे के लिए प्रार्थनाएं कर रही थी।

वह थोड़ा और आगे बढ़ी तो एक और घर से आवाज आई, जहाँ एक स्त्री ईश्वर से अपने बेटे को हर परेशानी से बचाने की दुआ कर रही थी। एक और घर से आवाज आ रही थी जहाँ एक पति अपनी पत्नी से कह रहा था कि वह मकान मालिक से कुछ और दिन की मोहलत मांग लें और उससे हाथ जोड़कर अनुरोध करें कि रोज-रोज आकर उन्हें तंग न करें।

थोड़ा और आगे बढ़ी तो एक बुज़ुर्ग दादी अपने पोते से कह रही थी, "बेटा, कितने दिन हो गए तुम मेरे लिए दवाई नहीं लाए।" पोता रोटी खाते हुए कह रहा था, "दादी माँ, अब मेडिकल वाला भी दवा नहीं देता और मेरे पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि मैं आपके लिए दवाई ले आऊं।"

थोड़ा और आगे बढ़ी तो एक घर से स्त्री की आवाज आ रही थी जो अपने भूखे बच्चों को यह कह रही थी कि आज तुम्हारे बाबा तुम्हें खाने के लिए कुछ ना कुछ जरूर लाएंगे, तब तक तुम सो जाओ। जब तुम्हारे बाबा आएंगे तो मैं तुम्हें जगा दूंगी। वह औरत कुछ देर वहीं खड़ी रही और सोचते हुए अपने घर की ओर वापस लौट गई कि जो लोग हमारे सामने खुश और सुखी दिखाई देते हैं, उनके पास भी कोई ना कोई कहानी होती है।

फिर भी, यह सब अपने दुख और दर्द को छुपाकर जीते हैं। वह औरत अपने घर वापस लौट आई और ईश्वर का धन्यवाद करने लगी कि उसके पास अपना मकान, संतान, और एक अच्छा पति है। हाँ, कभी-कभी पति से नोक-झोंक हो जाती है, लेकिन फिर भी वह उसका बहुत ख्याल रखता है। वह औरत सोच रही थी कि उसकी जिंदगी में कितने दुख हैं, मगर जब उसने लोगों की बातें सुनीं तो उसे यह एहसास हुआ कि लोगों के दुख तो उससे भी ज्यादा हैं।

सीख :---
जरूरी नहीं कि आपके सामने खुश और सुखी नजर आने वाले सभी लोगों का जीवन परफेक्ट हो। उनके जीवन में भी कोई न कोई परेशानी या तकलीफ होती है, लेकिन सभी अपनी परेशानी और तकलीफ को छुपाकर मुस्कुराते हैं। दूसरों की हंसी के पीछे भी दुख और मातम के आंसू छिपे होते हैं। कठिनाइयों और परीक्षणों के बावजूद जीना जीवन की वास्तविकता है, यही सच्ची जिंदगी है।

दोस्तों, अगर आपको कहानी पसंद आई हो तो एक लाइक और अपने दोस्तों से शेयर करना न भूलें! रोजाना ऐसी ही कहानियों के लिए फॉलो करें ।

11/08/2026

आज 30-35 साल तक के बच्चों के विवाह नहीं हो रहे है?

कारण क्या है ?

एक 24 वर्षीय लड़की के पिताजी को नजदीक के रिश्तेदार ने शादी के लिए एक रिश्ता बताया कि लड़का शहर में नौकरी करता है।

दिखने में खूबसूरत है।अच्छे व्यवहार वाला है माँ बाप भी अच्छे और पैसे वाले हैं
लड़के की उम्र 25 साल है, सबकुछ अच्छा है।

लड़की के पिताजी ने कहा कि वो सब ठीक है पर लड़के की कमाई कितनी है?

बिचौलिए ने बताया की अच्छी है। 30 हजार रुपये है। पैसे वाले परिवार से है।

लड़की के पिताजी ने जवाब दिया कि हूँ ...शहर में 30 हजार से क्या होता है? परिवार की कमाई से हमें क्या लेना-देना...

बिचौलिए ने कहा कि एक दूसरा लड़का भी है।...

दिखने में ठीक ठाक है।तनख्वाह अच्छा.... 50 हजार है।सिर्फ उसकी उम्र थोड़ी ज्यादा है। वह 28 साल का है।लडके पिताजी ने कहा कि 50 हजार ?शहर में 1BHK फ्लैट भी वह खरीद सकता है क्या??

सिर्फ 50 हजार में ?...

तो मेरी बेटी को कैसे खुश रख पायेगा वो!बिचौलिए ने हिम्मत नहीं हारी और एक बताया कि एक और भी है।

लड़का दिखने मे ठीक ठाक है। सिर्फ थोड़ा मोटा है। थोडे से बाल झड़ गए है दिमाग से काम करने के कारण तनख्वाह भी ज्यादा है।
1 लाख महीना है पर उम्र मात्र 32 साल है ?? देखो अगर आपको जँचता हो तो...

लड़की के पिताजी ने गुस्से में कहा कि क्या चाटना है 1 लाख पगार को? मेरी बेटी को तो खूबसूरत ही लड़का ही चाहिए।

और वो भी अकेला रहने वाला या बहुत छोटा परिवार। कमाई भी ज्यादा होनी चाहिए, वरना लड़की को खुश कैसे रखेगा?? मेरी लड़की भी कमाती है! कोई अच्छा रिश्ता बताइये जी
लड़का कम उम्र का हो,....

ऐसे ही बातो में 3 से 5 साल निकल गए।

फिर बिचौलिए को बुलाकर बात की उसने कहा की
अब मेरे पास आपकी लड़की के अनुरूप 30 से 35 साल वाले लड़के ही मेरी नजर में है।

आप बोलो तो बताऊ

लड़की के पताजी : "कोई भी लड़का बताइये!

इस उम्र में कही शादी हो जाये! ये क्या कम बड़ी बात है??
लड़की की उम्र भी तो 29/30 हो रही है!! अब मेरी लड़की ही बहुत बड़ी हो गयी है
तो मैं ज्यादा क्या उम्मीद रखूं।
ऐसी बातें करके लड़की और लड़को की जिंदगी के साथ खिलवाड़ रोज देखती हूँ! अंत में समझौता ही करते देखा जाता है!
आप अपने आस पास देखेंगे, तो बहुत बार शादी के बाद व्यक्ति का सब कुछ चला जाता है इसलिए पैसे को ही एकमात्र आधार नहीं बनाये!

सिर्फ एक सवाल का उत्तर दें कि जब आपकी शादी हुई थी तब आप कितना कमाते थे?

आज क्या आपके पास नहीं है!

लड़का-लड़की दोनों बराबर है ऐसे वक़्त मे आप भी थोड़ा लड़की एवं लड़के के पीछे खड़े रहिये।

पर लड़के-लड़कियों की शादी योग्य उम्र में करिये या होने दीजिए।और मां-बाप द्वारा शादी की बात करने पर घर में झगड़ा आम हो चुका है।
अपने माता पिता की भी ख्वाहिशों एवं पसंद का ध्यान रखिए। आप भले ही डिग्री में उनसे ज्यादा हैं।पर आपके माता पिता आपसे बहुत ज्यादा तज़ुर्बेकार हैं। और कोई भी अपने बच्चों के लिए गलत रिश्ते नहीं देखता है।

कई जगह तो अच्छे लड़कों को इसलिए छोड़ दिया क्यों कि लड़कियां जॉब कर रही थी और पढ़ाई में लड़कों से ज्यादा थी।
जबकि लड़के भले ही उनसे कम पढ़े थे .... परंतु उनके जैसी सैलरी वाले तो उनके परिवारिक व्यवसाय में जॉब कर रहे थे।
शादी के बाद जॉब करने वाली नहीं बल्कि परिवारिक काम में मददगार बहु चाहिए??

उनके माता पिता तो तैयार थे.... पर बच्चे नहीं माने!! उम्रभर पैसा और नौकरीं तो आते-जाते रहेगी....पर "जवानी" और "उम्र" वापस नहीं आएगी...

एक बार सोचे।

दहेज, दिखावा, महँगी शादी ज़िन्दगी जीने का तरीका नही है।
पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर जरूर कीजिएगा।🙏

18/07/2026

बनिया धन का भूखा होता है।
क्षत्रिय खून का प्यासा होता है।
दलित अन्न का भूखा होता है।
पर ब्राम्हण?
साहब ब्राम्हण सम्मान का भूखा होता है।
ब्राम्हण को सम्मान दे दो वो तुम्हारे लिऐ
जान देने को तैयार हो जाऐगा।
अरे दुनिया वालो आजमाकर
तो देखो हमारी दोस्ती को।

मुसलमान अशफाक उल्ला खान बनकर हाथ
बढ़ाता है,हम बिस्मिल बनकर गले लगा लेते है।

क्षत्रिय चंद्रगुप्त बनकर पैर छू लेता है,हम
चाणक्य बनकर पूरा भारत जितवा देते है।

सिख भगत सिह बनकर हमारे पास आता है।
हम चंद्रशेखर आजाद बनकर उसे बेखौफ
जीना सिखा देते है।

और
कोई शूद्र शबरी बनकर हमसे वर मागता है,
तो हम उसे भगवान से मिलवा देते है।
अरे एक बार सम्मान तो देकर देखो हमें.................. फर्ज न अदा करे तो कहना

-- पुराणों में कहा गया है -

विप्राणां यत्र पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता ।

जिस स्थान पर ब्राह्मणों का पूजन हो वंहा
देवता भी निवास करते हैं अन्यथा ब्राह्मणों
के सम्मान के बिना देवालय भी शून्य हो जाते हैं।

इसलिए

ब्राह्मणातिक्रमो नास्ति विप्रा वेद विवर्जिताः।।

श्री कृष्ण ने कहा - ब्राह्मण यदि वेद से हीन
भी तब पर भी उसका अपमान नही करना चाहिए।
क्योंकि तुलसी का पत्ता क्या छोटा क्या बड़ा वह हर
अवस्था में कल्याण ही करता है ।

ब्राह्मणोंस्य मुखमासिद्......

वेदों ने कहा है की ब्राह्मण विराट पुरुष भगवान
के मुख में निवास करते हैं इनके मुख से निकले हर
शब्द भगवान का ही शब्द है,
जैसा कि स्वयं भगवान् ने कहा है की

विप्र प्रसादात् धरणी धरोहम
विप्र प्रसादात् कमला वरोहम
विप्र प्रसादात्अजिता$जितोहम
विप्र प्रसादात् मम् राम नामम्।।

ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ही मैंने धरती को धारण
कर रखा है अन्यथा इतना भार कोई अन्य पुरुष कैसे
उठा सकता है,इन्ही के आशीर्वाद से नारायण हो कर
मैंने लक्ष्मी को वरदान में प्राप्त किया है,
इन्ही के आशीर्वाद से मैं हर युद्ध भी जीत गया और
ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ही मेरा नाम "राम" अमर
हुआ है,अतः ब्राह्मण सर्व पूज्यनीय है।

और ब्राह्मणों का अपमान ही कलियुग में पाप
की वृद्धि का मुख्य कारण है ।

- किसी में कमी निकालने की अपेक्षा किसी
में से कमी निकालना ही ब्राह्मण का धर्म है,


समस्त ब्राह्मण सम्प्रदाय
को समर्पित🙏🙏🙏🙏🙏

*****************
जय दादा परशुराम
***************

जयति सनातन💐
जयतु भारतं💐

14/07/2026

"क्या चार सौ रुपए की साड़ी पहनने वाली हर औरत चोर होती है?" रेलवे स्टेशन की उस भारी भीड़ में जब एक टिकट चेकर ने यह तीखा शब्द उछाला, तो वक़्त जैसे ठहर गया। तमाशबीनों की भीड़ मूक बनकर देख रही थी, और मैं... मैं अपनी चार घंटे लेट ट्रेन का इंतज़ार करते हुए, इस कड़वे सच का गवाह बन रही थी।

​मेरी ट्रेन लेट थी। दो घंटे का सफर तय करके वापस कानपुर वाले घर जाना और फिर लौटकर आना सिर्फ पैसों और वक्त की बर्बादी थी। इसलिए मैंने स्टेशन पर ही टहलने का फैसला किया। चहलकदमी करते हुए जैसे ही मैं एग्जिट गेट के पास पहुँची, मेरी नज़र एक महिला और टिकट चेकर पर थमी।
​चेकर बाहर जाने वालों के टिकट देख रहा था। उसने उस महिला को रोका—"टिकट प्लीज!"

​महिला ने बेहद सहजता से अपना बैग खोला। उंगलियां अंदर कुछ तलाशने लगीं... और अचानक उसके चेहरे का रंग उड़ गया। वह रुंधे गले से चिल्लाई, "मेरा पर्स... मेरा पर्स! सर, मेरा पर्स बैग में नहीं है। उसमें मेरे तीन सौ रुपये और टिकट दोनों थे।"

​भीड़ के बीच उसकी उंगलियां बदहवास होकर बैग का कोना-कोना छान रही थीं, लेकिन टिकट चेकर के चेहरे पर एक कुटिल, अर्थपूर्ण मुस्कान थी। बस स्टैंड हो या रेलवे स्टेशन, हमारे समाज को मुफ्त का तमाशा देखने की बड़ी गंदी आदत है। लोग रुककर तमाशा देखने लगे।

​महिला गिड़गिड़ाई, "भाई साहब, लगता है किसी ने भीड़ का फायदा उठाकर मेरा पर्स उड़ा लिया है।"

​"हूँ... बिना टिकट चलने वाले अक्सर यही बहाने बनाते हैं। सीधे जुर्माना निकालिए, मैं इन झांसों में नहीं आने वाला," टिकट चेकर ने रूखेपन से कहा।

​महिला ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ एक छोटा सा कीपैड मोबाइल आगे बढ़ाया, "आप समझ क्यों नहीं रहे? जब पर्स ही कट गया तो जुर्माना कहाँ से भरूँ? आप चाहें तो मेरा यह मोबाइल रख लीजिए, मैं पैसे लाकर इसे छुड़ा लूंगी। मेरी फैक्ट्री का पता नोट कर लीजिए।"

​लेकिन उस टिकट चेकर का दिल नहीं पसीजा। उसने जो कहा, उसने मेरे भीतर के इंसान को झकझोर दिया। वह बोला,

"मैडम, मैं आप जैसी लड़कियों के चोंचलों से खूब वाकिफ हूँ। चार सौ रुपए की साड़ी लपेटे, माँग भरे, लोगों की जेबें काटती फिरती हैं... क्या पता यह मोबाइल भी चोरी का हो?"

​'चोर' शब्द सुनते ही उस महिला का चेहरा तमतमा गया। आँखों में आँसू लिए वह हाथ जोड़कर बोली, "भाई साहब, प्लीज समझिए। मुझे फैक्ट्री पहुँचना है। देर हुई तो एब्सेंट लग जाएगी, एक दिन की दिहाड़ी कट जाएगी। यह पैसे मेरे घर-खर्च और मेरे बच्चों के लिए बहुत मायने रखते हैं।"

​अब मुझसे रहा नहीं गया। उस माँ की बेबसी और समाज की संवेदनहीनता ने मुझे आगे बढ़ने पर मजबूर कर दिया।

​मैंने आगे बढ़कर पूछा, "कितना जुर्माना भरना है?"

टिकट ​चेकर ने कुटिलता से मुस्कुराते हुए कहा, "आप भरेंगी?"

​"जी हाँ, मैं भरूँगी। आपको जुर्माने से मतलब है या इससे कि कौन भर रहा है?" मैंने सीधे उसकी आँखों में देखकर कहा।

​"लोकल पैसेंजर है, ₹200 निकालिए," उसने कहा।

​मैंने तुरंत पैसे उसकी तरफ बढ़ाए और कहा, "लीजिए, रसीद काटिए।"

रसीद लेकर मैंने उस महिला के हाथ में थमाई और टिकट चेकर को सुनाते हुए कहा, "लीजिए बहन जी, हाथ की पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं होतीं।"

​महिला ने दोनों हाथ जोड़कर रूआंसे गले से कहा, "बहन जी, बहुत-बहुत मेहरबानी। मेरी फैक्ट्री पास में ही है, चलिए मैं आपके पैसे लौटा देती हूँ।"

​तभी भीड़ में से किसी तमाशबीन ने फब्ती कसी, "अरे मैडम, इनका पूरा गैंग चलता है। एक पकड़ा जाए तो दूसरा छुड़ाने आ जाता है।"

​वह महिला यह सुनकर रो पड़ी। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, "बहन, 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।' ऐसी छिटाकशी करना इन तमाशबीनों का काम है।

आप जाइए, आपको फैक्ट्री के लिए देर हो रही है।"

​उसने रोते हुए कहा, "आप अपना पता दे दीजिए, मैं मनीऑर्डर..."

​"कोई ज़रूरत नहीं है," मैंने मुस्कुराकर कहा।

​"मगर आपके पैसे?"

​मैंने उसके सिर पर हाथ रखा और बेहद धीरे से कहा, "जब कभी जिंदगी में किसी और ज़रूरतमंद को इस मोड़ पर पाओ, तो उसकी मदद कर देना। मेरे पैसे चुकता हो जाएंगे।"

​मैं आगे बढ़ गई, और वह भीगी आँखों से मुझे निहारती रही। ट्रेन भले ही 4 घंटे लेट थी, लेकिन उस दिन मुझे लगा कि मेरा वहाँ रुकना बिल्कुल बेकार नहीं था।


​दोस्तों, आज का समाज तमाशा देखने में माहिर है, लेकिन किसी के आँसू पोंछने में नहीं। अगर उस दिन मैं चुप रहती, तो शायद एक माँ की गरिमा और उसके बच्चों का निवाला छीन जाता।

​👉 कमेंट सेक्शन में मुझे ज़रूर बताइए: क्या आपने कभी किसी अजनबी की इस तरह मदद की है? या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है जब किसी फरिश्ते ने आपकी लाज बचाई हो?
​इस पोस्ट को ज़्यादा से ज़्यादा Share करें ताकि समाज में ऐसी सोच ज़िंदा रहे। प्रोफाइल को Follow करना न भूलें! 🌹🙏

11/07/2026

एक महिला अपनी जवान बेटी के साथ रहती थी। अपनी बेटी की शादी को लेकर बहुत परेशान रहती है, तभी अचानक उसकी मुलाकात उसकी बचपन की सहेली से होती है, सहेली बताती है कि उसका एक बेटा है जो अच्छी नौकरी करता है।

ये सुनने के बाद वो औरत भी अपनी बेटी के बारे में बताती है कि उसकी भी एक बेटी है जिसकी शादी करनी है, यदि तुम चाहो तो मेरी बेटी को देख सकती हो।

उसकी सहेली इस बात के लिये राजी हो जाती है और एक दिन उसके बेटी को देखने उसके घर चली जाती है।

बेटी को देखते ही वो उसे अपने बेटे के लिये पसंद कर लेती है और थोड़ा बात आगे बढ़ाते हुये कहती है कि " अब जब तुम्हारी बेटी पसंद आ गयी है तो थोड़ा लेन देन पर भी चर्चा कर लेते हैं, अब तुम तो जानती ही हो मेरा बेटा बहुत बड़ी कंपनी में जॉब करता है, उसको पढ़ाने लिखाने में भी तो बहुत खर्च हुआ है तो 25 लाख दहेज तो बनता ही है, दूसरे लोग तो 30- 40 लाख भी देने को तैयार हैं, लेकिन अब तुम बचपन की सहेली हो और तुम्हारी बेटी मुझे पसंद भी आ गयी है तो....

अभी वो औरत कुछ बोलती ही की उसके पहले उसकी बेटी ने बोला कि "आंटी बस इतना ही! अरे जब आप का बेटा पेट में होगा तो जो आप ने खाया पिया होगा उसके बाद उसके पैदा होने में जो खर्च हुआ होगा? उसके बाद जब उसको खिलाया पिलाया होगा उसका खर्चा भी जोड़ लीजिए, लेकिन कहीं और जाकर मुझे आप जैसे लालची परिवार में शादी नहीं करना है।

इतना अपमानित होने के बाद सहेली तो चली गयी, लेकिन माँ ने बेटी को समझाया कि बेटा तुम्हें ऐसे बात नहीं करना चाहिए था हम तो थे ही....

बेटी ने बोला "माँ मुझे मालूम है आप इतने दहेज का इंतजाम कैसे भी कर के मेरी शादी कर देती, लेकिन उसके बाद भी उनका पेट नहीं भरता , वो पूरी जिंदगी आप से मांग करते रहते....
ये जानकर कि मैं इकलौती हूँ और जो कुछ है मेरा है,आप लोगों का भी जीवन है माँ , मुझे किसी दहेज लोभी के यहाँ विवाह ही नहीं करना.

माँ! बेटी के इस बात का कोई ज़वाब नहीं दे पायी, लेकिन मन ही मन सोच रही थी काश ऐसा हो सकता.......

ऐसे दहेज लोभियों से सावधान रहें, सतर्क रहे ताकि आने वाले समय में पछताना न पड़े।

पोस्ट अच्छी लगी हो तो शेयर जरूर कीजिएगा🌹🌹🙏

08/07/2026

विमला जी स्तब्ध रह गईं। उन्होंने पहली बार अंजलि के थके हुए चेहरे, उसकी सूजी हुई लाल आँखों और उसके भीतर के उस खालीपन को गहराई से महसूस किया, जिसे वो 'फ़र्ज़' के नाम पर लगातार नज़रअंदाज़ करती आ रही थीं।

शरद ऋतु की हल्की ठंडक के बीच घर में शहनाइयों की गूंज और गेंदे के फूलों की महक छाई हुई थी। घर की लाडली, शिखा की शादी में अब बस कुछ ही दिन बचे थे। पूरे घर में उथल-पुथल मची थी। शिखा की माँ, विमला जी के माथे पर हमेशा चिंता की लकीरें खिंची रहती थीं। हलवाई ने सामान की लिस्ट नहीं दी, टेंट वाले ने पर्दों का रंग गलत लगा दिया, मेहमानों के कमरे अभी तक साफ नहीं हुए—ऐसी तमाम बातें वो दिन भर रटती रहती थीं और परेशान होती थीं।

ऐसे समय में घर की बड़ी बहू, अंजलि ने बिना कुछ कहे घर की पूरी बागडोर अपने हाथों में ले ली। अंजलि सुबह पाँच बजे उठकर सबसे पहले चाय-नाश्ते का इंतजाम देखती, फिर शिखा के साथ बाज़ार जाकर उसकी शॉपिंग करवाती, दर्जी के चक्कर काटती और घर लौटकर रिश्तेदारों के लिए बिस्तर और खाने की व्यवस्था में जुट जाती। रात के बारह कब बज जाते, उसे खुद पता नहीं चलता था।

उसके पैरों में दर्द से हूक उठती थी, आँखों के नीचे काले घेरे साफ नज़र आने लगे थे, लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान कभी कम नहीं हुई। अंजलि के लिए शिखा सिर्फ एक ननद नहीं, बल्कि सगी छोटी बहन जैसी थी। उसने अपने ही मायके की तरह इस शादी को दिल से अपना लिया था।

जैसे-जैसे शादी का दिन करीब आया, घर मेहमानों और रिश्तेदारों से भर गया। बुआ जी, मौसी जी और दूर-दराज के मामा-मामी सब आ चुके थे। अंजलि एक पल के लिए भी चैन से नहीं बैठ रही थी। किसी को नहाने के लिए गर्म पानी चाहिए, किसी को सुबह की कड़क चाय, तो किसी को बाजार से कुछ मंगवाना है—सबके होंठों पर बस एक ही नाम था, "अंजलि"।(पूजा मिश्रा)

एक दोपहर, जब हॉल में सब रिश्तेदार बैठकर मेहंदी की रस्म का इंतज़ार कर रहे थे, तब बड़ी बुआ जी ने विमला जी से कहा, "विमला, तू तो सच में बहुत किस्मत वाली है। अंजलि जैसी बहू पाई है तूने। देखो बेचारी कैसे चकरी की तरह पूरे घर में घूम रही है। शादी का आधा से ज्यादा बोझ तो इस अकेली लड़की ने अपने कंधों पर उठा रखा है। हमने तो यहाँ आकर एक गिलास पानी के लिए भी खुद को कष्ट नहीं दिया, अंजलि ने सब इतनी अच्छी तरह संभाल लिया है।"

पास ही बैठी मौसी जी ने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, "बिल्कुल सही कह रही हो दीदी, आजकल ऐसी बहुएं कहाँ मिलती हैं जो ननद की शादी में नौकरों की तरह खटें। यह तो सच में तारीफ के काबिल है।"

विमला जी को अपनी बहू की यह तारीफ कुछ रास नहीं आई। उन्हें लगा कि कहीं अंजलि के सिर पर इस तारीफ का खुमार न चढ़ जाए और वह काम करना कम न कर दे। उन्होंने तुरंत नाक-भौं सिकोड़ते हुए कहा, "अरे बुआ जी, इसमें इसने इतना क्या अनोखा काम कर दिया? ये तो हर बहू का फ़र्ज़ होता है। घर में शादी है तो काम तो करना ही पड़ेगा न।

मेरे समय में तो हम पूरी-पूरी रात जागकर चक्कियां पीसते थे और सुबह उठकर खाना बनाते थे, तब किसी ने हमारी इतनी तारीफ नहीं की। आप लोग बेकार ही इसे चने के झाड़ पर मत चढ़ाओ, कुछ खास नहीं कर दिया है इसने।"

रसोई के दरवाजे के पास खड़ी अंजलि ट्रे में शरबत के गिलास सजा रही थी। विमला जी के ये शब्द उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। उसका गला रुंध गया और आँखों में आंसू आ गए। जिस घर को वह अपना मानकर, अपनी नींद और चैन भूलकर काम कर रही थी, वहाँ उसकी अथक मेहनत का मोल सिर्फ एक 'फ़र्ज़' बताकर चुका दिया गया। उसने एक गहरी सांस ली, अपने आंसुओं को पलकों के पीछे ही सोख लिया और चेहरे पर एक झूठी मुस्कान सजाकर शरबत लेकर बाहर आ गई। उसने किसी से कोई शिकायत नहीं की, क्योंकि वह घर की खुशियों में कोई खलल नहीं डालना चाहती थी।

आखिरकार वो दिन भी आ गया जब शिखा लाल जोड़े में सजी मंडप में बैठी थी। शादी की सारी रस्में बहुत ही खूबसूरती से पूरी हुईं। हर तरफ व्यवस्था और खाने की तारीफ हो रही थी, और विमला जी गर्व से सबका अभिवादन स्वीकार कर रही थीं।

अगली सुबह विदाई का समय आ गया। पूरे घर का माहौल गमगीन था। विमला जी फूट-फूट कर रो रही थीं। शिखा सबसे गले मिल रही थी। पिता और भाई के गले लगने के बाद शिखा अंजलि के पास आई। अंजलि ने अपनी ननद को कसकर गले लगा लिया और उसे हमेशा खुश रहने का आशीर्वाद दिया।

तभी शिखा ने अंजलि के कंधे से अपना सिर उठाया और अपनी माँ की तरफ देखकर भारी, लेकिन स्पष्ट आवाज़ में बोली, "मम्मी, आपने मुझे हमेशा एक राजकुमारी की तरह रखा। लेकिन आज यहाँ से जाते-जाते मैं आपको एक सच बताना चाहती हूँ। आप हमेशा कहती हैं न कि भाभी ने जो किया वो बस उनका फ़र्ज़ था? नहीं मम्मी, कोई भी फ़र्ज़ रातों की नींद खराब करके, भूखे पेट रहकर और दूसरों के तानें सुनकर नहीं निभाया जाता। भाभी ने जो किया है, वो फ़र्ज़ नहीं, उनका मेरे लिए और इस परिवार के लिए निस्वार्थ प्यार था।"

शिखा ने विमला जी का हाथ पकड़ा और उसे अंजलि के हाथ में देते हुए आगे कहा, "मेरी शादी इतनी शानदार इसलिए हुई क्योंकि भाभी ने अपनी खुशियां और आराम भूलकर मेरी खुशियों का ध्यान रखा। आज आपकी एक बेटी इस घर से हमेशा के लिए जा रही है, लेकिन प्लीज... अपनी इस दूसरी बेटी को पहचान लीजिए। इन्हें सिर्फ काम करने वाली बहू मत समझिए मम्मी।"(पूजा मिश्रा)

विमला जी स्तब्ध रह गईं। उन्होंने पहली बार अंजलि के थके हुए चेहरे, उसकी सूजी हुई लाल आँखों और उसके भीतर के उस खालीपन को गहराई से महसूस किया, जिसे वो 'फ़र्ज़' के नाम पर लगातार नज़रअंदाज़ करती आ रही थीं।

शिखा की विदाई के बाद जब घर में सन्नाटा पसरा था, विमला जी धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई रसोई में गईं। अंजलि वहां अकेली खड़े होकर जूठे बर्तन समेटने में लगी थी।

विमला जी ने धीरे से आगे बढ़कर अंजलि के हाथ से बर्तन ले लिए। अंजलि ने चौंककर देखा। विमला जी की आँखों में आंसू थे। उन्होंने अंजलि का माथा चूमते हुए रुंधे गले से कहा, "बहुत थक गई है न मेरी बच्ची? जा, जाकर सो जा। आज से इस घर का कोई काम तेरा 'फ़र्ज़' नहीं है, बल्कि इस घर पर और मुझ पर तेरा एक बेटी का 'हक' है। मुझे माफ़ कर दे बेटा।"

अंजलि के सालों से रुके हुए आंसू आज बह निकले, लेकिन आज वो दर्द के नहीं, बल्कि उस सुकून के आंसू थे जो एक बेटी को अपनी माँ के गले लगकर मिलते हैं। उस दिन उस घर में एक ननद तो विदा हो गई, लेकिन एक बहू को हमेशा के लिए उसका असली घर मिल गया।

कहानी पसंद आई हो तो like comment share और follow जरूर करें जी 🙏🙏🙏

पूजा मिश्रा ❤️

07/07/2026

🔥चौदह प्रकार के लोग जो मृततुल्य हैं।

राम-रावण युद्ध चल रहा था, तब अंगद ने रावण से कहा- तू तो मरा हुआ है, मरे हुए को मारने से क्या फायदा?

रावण बोला– मैं जीवित हूँ, मरा हुआ कैसे?

अंगद बोले, सिर्फ साँस लेने वालों को जीवित नहीं कहते - साँस तो लुहार की धौंकनी भी लेती है!

तब अंगद ने मृत्यु के १४ प्रकार बताए-

१. कामवश: जो व्यक्ति अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है। जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है। वह अध्यात्म का सेवन नहीं करता है, सदैव वासना में लीन रहता है।

२. वाममार्गी: जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले, जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो, सत्य वैज्ञानिक नियमों, परंपराओं, धर्म एवं लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है। ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं।

३. कंजूस: अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जो व्यक्ति धर्म कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याणकारी कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो, दान एवं यज्ञ करने से बचता हो, ऐसा आदमी भी मृतक समान ही है।

४. अति दरिद्र: गरीबी सबसे बड़ा श्राप है। जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वह भी मृत ही है। अत्यंत दरिद्र भी मरा हुआ है। गरीब आदमी को दुत्कारना नहीं चाहिए, क्योंकि वह पहले ही मरा हुआ होता है। दरिद्र मानकर उनकी मदद करनी चाहिए। उनके प्रति करुणा का भाव रखना चाहिए।

५. विमूढ़: अत्यंत मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ ही होता है। जिसके पास बुद्धि-विवेक न हो, जो खुद निर्णय न ले सके, यानि हर काम को समझने या निर्णय लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृतक समान ही है, मूढ़ अध्यात्म को नहीं समझता।

६. अजसि: जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है। जो घर-परिवार, कुटुंब-समाज, नगर-राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता, वह व्यक्ति भी मृत समान ही होता है।

७. सदा रोगवश: जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है। स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है। नकारात्मकता हावी हो जाती है। व्यक्ति मृत्यु की कामना में लग जाता है। जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है।

८. अति बूढ़ा: अत्यंत वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। शरीर और बुद्धि, दोनों अक्षम हो जाते हैं। ऐसे में कई बार वह स्वयं और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके।

९. सतत क्रोधी: २४ घंटे क्रोध में रहने वाला व्यक्ति भी मृतक समान ही है। ऐसा व्यक्ति हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करता है। क्रोध के कारण मन और बुद्धि दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता। पूर्व जन्म के संस्कार लेकर यह जीव क्रोधी होता है। क्रोधी अनेक जीवों का घात करता है और नरकगामी होता है।

१०. अघ खानी: जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए। पाप की कमाई पाप में ही जाती है और पाप की कमाई से नीच गोत्र, निगोद की प्राप्ति होती है।

११. तनु पोषक: ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना न हो, ऐसा व्यक्ति भी मृतक समान ही है। जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकी किसी अन्य को मिलें न मिलें, वे मृत समान होते हैं। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं। शरीर को अपना मानकर उसमें रत रहना मूर्खता है, क्योंकि यह शरीर विनाशी है, नष्ट होने वाला है।

१२. निंदक: अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसे दूसरों में सिर्फ कमियाँ ही नजर आती हैं, जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है, ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे, तो सिर्फ किसी न किसी की बुराई ही करे, वह व्यक्ति भी मृत समान होता है। परनिंदा करने से नीच गोत्र का बंध होता है।

१३. परमात्म विमुख: जो व्यक्ति ईश्वर यानि परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है। जो व्यक्ति यह सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं; हम जो करते हैं, वही होता है, संसार हम ही चला रहे हैं, जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है।

१४. श्रुति संत विरोधी: जो वेदादि सत्य सत्य आर्ष शास्त्रों एवं संत पुरुषों विरोधी है, वह भी मृत समान है। श्रुत और संत, समाज में अनाचार पर नियंत्रण (ब्रेक) का काम करते हैं। अगर गाड़ी में ब्रेक न हो, तो कहीं भी गिरकर एक्सीडेंट हो सकता है। वैसे ही समाज को संतों की जरूरत होती है, वरना समाज में अनाचार पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा।

अतः मनुष्य को उपरोक्त चौदह दुर्गुणों से यथासंभव दूर रहकर स्वयं को मृतक समान जीवित रहने से बचाना चाहिए।

🪷🪷🪷🙏🏻 वेद वरदान आर्य धर्म योद्धा कर्म वीर🙏🏻

06/07/2026

मेरे पति 6 महीने बाद परदेश से गांव आये। जैसे ही आकर बैठे मेरी सासू जी ने आकर कहा- "आ गया मेरा लाल! कितना दुबला पतला लग रहा है रे! खाली काम के चक्कर में रहता है? आराम भी नहीं करता क्या!

""दस घंटे की शिफ्ट है अम्मा जी, बैठकर थोड़े काम करते हैं! ये लो, तुम्हारी पसंदीदा शाल!" --कहकर उन्होंने शाल का पैकेट सासू जी को थमा दिया।

"कितने का है?

""700 सौ का!""

इतना मंहगा शाल लाने की क्या जरूरत थी? इसके पैसे से तू खुद के लिए फल ले लेता! देख , तू कितना कमजोर हो गया है? अब तो सर्दी का मौसम भी आ गया है!"- -मां जी ने शिकायत भरे लहजे मे कहा....

पूरा दिन घरवालों से मिलने में बीत गया! रात हुई, तो एकांत में उसने बैग खोलकर एक छोटा पैकेट निकाला और मेरी ओर बढ़ाया--

"क्या है ये?"

"तुम्हारी पसंदीदा विदेशी चाकलेट, खास तेरे लिए!"

"केवल मेरे लिए ही क्यों!"

"अरे समझा करो। सबके लिए मिठाई तो लाया ही हूं!"

"कितने का है?"

"पांच सौ का!"

"हाय रे!" "इम्पोर्टेड ब्रांड है!"

"तो क्या फर्क पड़ता!" "तू नहीं समझेगी!

खाकर के देखना!"

"पर घर में और लोग भी हैं। माँ, बाबूजी, दो भाई, सब यूज कर लेते तो क्या बिगड़ जाता!"

"अरे यार बहुत मंहगी है?, बस एक ही पैकेट मिली ही हैं इसमें, सबके लिए कहाँ से लाता!"

"तो शेयर करके यूज कर लेते!"

"और तू!"

"बहुत चाहते हो मुझे?"

"ये भी कोई पूछने वाली बात है!"

"वाह! कितनी लकी हूँ मैं जो तू मेरा पति है!

"मेरी आँखें नम हो गईं...

"तुम्हारे जैसा पति बहुत किस्मत से मिलता है!"

"सच कह रही हूं.... लेकिन जानते हैं, ये खुशकिस्मती मुझे किसने दी?"

"किसने?"

"तुम्हारे माँ और बाबूजी ने! उन्होंने ही तुझे इतना हँसमुख, मेहनती और चाहने वाला इंसान बनाया!

सोचों...., तुम्हारे जन्म पर खुशी मनाने के लिए मैं नहीं थी, एक मासूम बच्चे से जवान बनने तक, पढ़ाने-लिखाने और कमाने लायक बनाने तक मैं नहीं थी। मैं तुम्हारे जीवन में आऊँ, इस लायक भी उन्होंने ही तुझे तराशा!"

"तू आखिर क्या कहना चाहती है?"

"यही कि ये पैकेट कल सुबह खुलेगा!

एक मां है, जो 700 सौ की शाल पर भी इसलिए दुखी होती है कि उसके बेटे ने खुद पर खर्च नहीं किया!

और वो बेटा पांच सौ की चाकलेट चुपके से अपनी बीबी को दे, ये सही लग रहा है तुम्हे!"

वो खामोश हो गया!

मैंने बात जारी रखी..."माँ-बाबूजी गाँव में रहते हैं! तू ही एकमात्र कमाने वाला शहरी है। बहुत सारी चीजें ऐसी होंगी, जो उन्हें कभी नसीब न होंगी, नाम भी न सुन पाएँगे! भगवान ने तुझे ये मौका दिया है कि तू उन्हें ये अनोखी खुशियाँ दे!

वैसे कल को हमारे भी बच्चे होंगे! अगर यही वे करेंगे तो......!

"अचानक उन्हें होश आ गया। चाकलेट का पैकेट वापस बैग में रखकर वो बिस्तर पर लेटा और आँसू पोंछने लगा!

"क्या हुआ? बुरा लगा?"

"मर्दों को कमजोरी नहीं दिखानी चाहिए! अपनी असली खुशी को पहचानो! जिंदगी का सच्चा मजा अपनों को हँसते देखने में है!
समझे पतिदेव....."💞🌹🙏

04/07/2026

परसों सुबह की बात है, मैं हॉल में बैठी लैपटॉप पर काम कर रही थी। पापा न्यूज़पेपर पढ़ रहे थे। तभी अचानक रसोई से कप-प्लेट के टकराने की आवाज़ आई। मैं दौड़कर गई, तो देखा कि पापा अपने लिए चाय छानने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनके हाथ इस कदर कांप रहे थे कि आधी चाय स्लैब पर बिखर चुकी थी।
मुझे देखते ही पापा के चेहरे पर एक अजीब सा डर और झिझक आ गई, जैसे कोई छोटा बच्चा कोई गलती करके सहम जाता है। वो बहुत धीमी आवाज़ में बोले— "वो... बिटिया, मैं सोच रहा था कि तू काम कर रही है, तो खुद ही चाय ले लूँ। हाथ अचानक कांप गया।"
मैंने कुछ नहीं कहा। कपड़ा लेकर स्लैब साफ़ किया, पापा का हाथ पकड़ा और उन्हें लाकर डाइनिंग टेबल पर बिठाया। खुद चाय छानकर उनके हाथ में थमाई।
उस पल जब मैंने पापा के चेहरे को गौर से देखा, तो मेरा दिल बैठ गया। उनके सफेद होते बाल, चेहरे की झुर्रियाँ और उनकी वो आँखें... जो कभी एक सख्त और मजबूत पिता की हुआ करती थीं, आज वो एक अबोध बच्चे जैसी मासूम और लाचार लग रही थीं।
🥺 ...
शाम को पापा को डॉक्टर के पास ले जाना था। पापा अपनी चप्पल ढूंढ रहे थे, जो बेड के नीचे थोड़ी दूर चली गई थी। वो झुकने की कोशिश कर रहे थे, पर उनके घुटनों ने जवाब दे दिया।
मैंने बिना कुछ सोचे नीचे घुटनों के बल बैठकर, पापा के पैरों में खुद चप्पल पहनाई। जैसे ही मैंने ऊपर देखा, पापा की आँखों से दो आँसू टपक कर मेरे सर पर गिरे।
उन्होंने मेरे सर पर हाथ रखा और भर्राई हुई आवाज़ में बोले— "बिटिया, एक दौर था जब मैं तुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाता था, तेरी चप्पल के फीते बांधता था। आज वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि मैं बूढ़ा हो गया और मेरी गुड़िया मेरी माँ बन गई।"
मैं वहीं पापा के घुटनों से लिपटकर रो पड़ी।
सचमुच, पिता वो वटवृक्ष होते हैं जो पूरी ज़िंदगी धूप-आंधी झेलकर अपने परिवार को छांव देते हैं। पर एक वक्त ऐसा आता है जब उस विशाल पेड़ को भी सहारे की ज़रूरत होती है। बेटियां कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाएं, जब वो अपने बूढ़े पिता को बच्चे की तरह संभालने लगती हैं, तो वो सिर्फ एक बेटी नहीं रहतीं, अपने पापा की 'माँ' बन जाती हैं।

💬 क्या आपने भी अपने पापा की ढलती उम्र में उनके अंदर के उस मासूम बच्चे को महसूस किया है? क्या आपको भी लगता है कि पापा का बूढ़ा होना दुनिया का सबसे भावुक अहसास है?
अपने पापा के लिए अपना प्यार और सम्मान नीचे कमेंट्स में ज़रूर व्यक्त करें! 👇✨

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