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समाधि आ रही है, कैसे जानोगे#ओशो#मेडिटेशन 14/09/2026

https://youtu.be/p2xMUNRcs1Q?is=IBIXYyraLzmXeZxpPawan Kumar

समाधि आ रही है, कैसे जानोगे#ओशो#मेडिटेशन ओशो के इस गहन प्रवचन Audiobook) में आपका स्वागत है। गीता के मूल र...

10/09/2026

As of today, I’ve decided to sell all the iPhones we have at home and buy a phone from a cheaper company instead! Whoever makes iPhones is definitely going to hell!Pawan Kumar

07/09/2026

Osho often said that 13–14 years is the age when a person becomes biologically/sexually mature — and that this is also where most people’s psychological growth stops.
His main points:
• Nature’s job is finished around 13–14. By then the body is capable of reproduction. After that, biology has no further interest in developing intelligence or awareness. Further growth is left to the individual (meditation, inquiry, etc.). Most people never take that extra step, so their mental age remains stuck near 13–14 even if they live to 70 or 80.
• He repeatedly cited army intelligence tests from the World Wars: the average mental age of soldiers was found to be 13 to 13.5 years. He used this as evidence that the typical human being does not grow psychologically after sexual maturity.
• Society, he said, wants people to stay at that age. A sexually mature but psychologically immature person is easier to control, to channel into money, religion, nationalism, etc. Once someone goes beyond 14 in awareness, they start questioning everything.
• He distinguished growing old (which happens automatically) from growing up / becoming mature (which requires conscious work). Most people only grow old; they remain “old children.”
In short: Osho’s view was that 13–14 is the natural point of biological maturity, but psychological and spiritual maturity almost never happens at that age — and for most people it never happens at all.
Pawan Kumar

31/08/2026

हाँ, लगभग हर देश पर कर्ज है। भारत अकेला नहीं है। दुनिया के ज़्यादातर देशों की सरकारें कर्ज लेकर खर्च चलाती हैं — सड़क, रेल, शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा और कल्याण योजनाओं पर।
कर्ज को दो तरीके से देखा जाता है:
1. कुल कर्ज की राशि (Absolute Debt)
यहाँ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का कर्ज स्वाभाविक रूप से बड़ा दिखता है:
• अमेरिका: लगभग 40 ट्रिलियन डॉलर (सबसे ज्यादा)
• चीन: लगभग 22 ट्रिलियन डॉलर
• जापान: लगभग 9 ट्रिलियन डॉलर
• भारत: लगभग 3.4–3.5 ट्रिलियन डॉलर (दुनिया में 8वें स्थान के आसपास)
2. GDP के प्रतिशत के रूप में कर्ज (Debt-to-GDP Ratio) — यह ज्यादा महत्वपूर्ण है
यह बताता है कि अर्थव्यवस्था के आकार के मुकाबले कर्ज कितना भारी है।
भारत की स्थिति (2025-26 के आसपास):
• सिर्फ केंद्र सरकार का कर्ज: GDP का लगभग 56%
• केंद्र + राज्य सरकारें मिलाकर (General Government): GDP का लगभग 80–84%
तुलना के लिए कुछ प्रमुख देश (2026 के अनुमान, IMF के अनुसार):
देश
कर्ज GDP का प्रतिशत (लगभग)
जापान
204%
सिंगापुर
172%
अमेरिका
126%
इटली
138%
फ्रांस
118%
चीन
107%
ब्रिटेन
104%
भारत
83%
जर्मनी
65%
भारत का अनुपात कई विकसित देशों से कम है। जापान का कर्ज उसके GDP से दोगुने से भी ज्यादा है, फिर भी वो संभाल रहा है क्योंकि ज्यादातर कर्ज उसके अपने देश के अंदर का है।
महत्वपूर्ण बातें
• भारत का ज़्यादातर कर्ज घरेलू (आंतरिक) है, विदेशी कर्ज कम है। यह अच्छी बात मानी जाती है।
• सरकार का लक्ष्य है कि 2030-31 तक केंद्र का कर्ज-GDP अनुपात लगभग 50% के आसपास लाया जाए।
• कर्ज हमेशा खराब नहीं होता। अगर उससे उत्पादक काम (इंफ्रास्ट्रक्चर, कैपिटल एक्सपेंडिचर) हो रहे हैं और अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है, तो वो प्रबंधनीय रहता है।
संक्षेप में — हाँ, दुनिया के लगभग सभी देशों पर कर्ज है। भारत का कर्ज बड़ा है, लेकिन अर्थव्यवस्था के आकार के हिसाब से कई अमीर देशों से बेहतर स्थिति में है।
Bharat JodoBJP DelhiPawan Kumar

31/08/2026

ध्रुव राठी का नाम तो सुना ही होगा।
मैंने जर्मनी में उनकी पत्नी जूली के कुछ मित्रों से उनकी मानसिक स्थिति का आकलन किया था। वे जर्मनी के बर्लिन में रहते हैं—पत्नी जूली (जर्मन नागरिक) और बच्चे के साथ।
अगर आप स्वयं से प्यार करते हैं और अपने विवेक से संतुष्ट हैं, तो उनके हर सोशल प्लेटफॉर्म से अनसब्सक्राइब कर दीजिए। आपको सही मायने में सुकून मिलेगा।
उनके बारे में अभी सारा पोल खोल देना ठीक नहीं होगा। बस इतना कहकर बात खत्म करना चाहता हूँ कि वे अपनी जाति के राजनेता को ही माई-बाप मानते हैं। बचपन से ही कुछ मुद्दों पर उनका दिमाग धोया जा चुका है। भोली-भाली और सादगी भरी सूरत का वे नाजायज फायदा उठाते हैं।
उन्होंने भारतीय यूजर्स से काफी पैसा कमाया है। अब समय आ गया है कि जो लोग आपके लाइक और सब्सक्राइब की वजह से बहुत ऊँचे आसमान में उड़ रहे हैं, उन्हें धरती पर उतारा जाए।
आज से ही शुरू कर दीजिए—उन्हें धरती माँ की गोद में लोरियाँ सुनाने की आदत डाल दीजिए।
Indian Cricket TeamBharat Jodo

25/08/2026

एक मिनट आँखें बंद करके लंबी, गहरी साँस भरिए… और फिर धीरे-धीरे साँस छोड़िए। इस प्रक्रिया को कई बार दोहराइए।

फिर थोड़ा मंथन कीजिए, मित्रों—जो मैं अब लिखने जा रहा हूँ।

कभी आपने सोचा है कि आपके द्वारा किया गया एक-एक सब्सक्राइब, आपके द्वारा देखी गई एक-एक वीडियो और अलग-अलग ऐप्स पर आपकी मौजूदगी से कितने लोग पैसे छाप रहे हैं?

नाम लिखूँगा तो दुश्मनी और बढ़ जाएगी। वैसे भी यहाँ हज़ारों से दुश्मनी मुझसे पहले ही ले रखी है। लेकिन मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

कोविड काल से अब तक जो लोग राजनीतिक, न्यूज़ और धर्म के नाम पर चैनल चला रहे हैं और लगातार आपको अपनी बातों में उलझाकर मूर्ख बना रहे हैं—उन्हें तुरंत अनसब्सक्राइब कीजिए।

जो बड़े न्यूज़ चैनलों के पॉडकास्ट में भी दिखाई देते हैं और साथ-साथ अपने निजी YouTube चैनल पर भी उसी दर्शक वर्ग से मलाई खा रहे हैं—उन्हें भी अभी अनसब्सक्राइब कर दीजिए।

हाँ, जो आपको हँसा रहा है, गीत सुना रहा है, कविताएँ सुना रहा है, स्वास्थ्य और व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी उपयोगी जानकारी दे रहा है—उसे पूरी इज़्ज़त दीजिए।

क्योंकि हर सब्सक्राइब सिर्फ़ एक क्लिक नहीं है; वह आपकी स्वीकृति है, आपका ध्यान है और आपकी मेहनत की कमाई से बनी उस व्यवस्था में आपका योगदान है।

अपने ध्यान का इस्तेमाल सोच-समझकर कीजिए।

ऐसा करेंगे तो धीरे-धीरे आपकी आत्मा में स्वाभिमान के बीज अंकुरित होंगे।

~ ओशो Pawan Kumar

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